राजस्थान हाईकोर्ट ने पति पर क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप रद्द किए, कहा - सुसाइड नोट से पता चलता है कि पत्नी उसके साथ खुश थी
Shahadat
28 April 2026 9:44 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने पाया कि मृतक पत्नी द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट से यह संकेत मिलता है कि उसका आरोपी पति के साथ रिश्ता खुशहाल था। उसे न तो प्रताड़ित किया गया था और न ही कोई नुकसान पहुंचाया गया था। इसके अलावा, पति ने न तो उससे दहेज की मांग की थी और न ही उसे आत्महत्या करने के लिए उकसाया था।
इसके विपरीत, कोर्ट ने यह भी पाया कि सबूतों के अनुसार, मृतक का अपनी बेटी के साथ रिश्ता तनावपूर्ण था, जिसके कारण वह डिप्रेशन में चली गई। ऐसे में पति के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई मामला नहीं बनता है।
कोर्ट पति की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने सेशंस कोर्ट में लंबित आपराधिक मामला रद्द करने की मांग की थी। यह मामला IPC की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498A (क्रूरता) के तहत दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता (पति) के खिलाफ एक FIR दर्ज की गई, जिसमें उस पर और उसके परिवार पर बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने के आरोप लगाए गए। जांच के बाद चूंकि परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ कोई मामला नहीं पाया गया, इसलिए आरोप केवल पति के खिलाफ ही तय किए गए। इन्हीं आरोपों को तय किए जाने के खिलाफ याचिकाकर्ता पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
संबंधित सुसाइड नोटों की बारीकी से जांच करने के बाद जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने पाया कि दोनों नोटों को सरसरी तौर पर पढ़ने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि मृतक पत्नी और याचिकाकर्ता पति के बीच का रिश्ता अच्छा और सौहार्दपूर्ण था, और वह अपने पति के साथ खुश थी।
कोर्ट ने यह भी पाया कि FSL रिपोर्ट के अनुसार, सुसाइड नोटों में लिखी लिखावट मृतक की लिखावट से मेल खाती है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की,
"मृतक का अपनी बेटी के साथ रिश्ता तनावपूर्ण था और बेटी अपनी माँ (यानी मृतक) से नफ़रत करती थी।"
इसी वजह से मृतक "डिप्रेशन में चली गई और उसने आत्महत्या कर ली।"
इसके साथ ही अपराध के आवश्यक तत्वों को प्रथम दृष्टया अनुपस्थित पाते हुए कोर्ट ने कार्यवाही रद्द की और याचिका स्वीकार की।
Case title: Ashish Kumar Sharma v/s State of Rajasthan & Anr.

