अंतरिम आदेश के लिए नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट से किसी पक्ष के अधिकार तय नहीं होते: राजस्थान हाईकोर्ट

Praveen Mishra

16 July 2026 5:07 PM IST

  • अंतरिम आदेश के लिए नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट से किसी पक्ष के अधिकार तय नहीं होते: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 39 नियम 7 के तहत नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर का उद्देश्य किसी पक्ष के लिए साक्ष्य जुटाना नहीं, बल्कि अदालत को विवादित संपत्ति की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन उपलब्ध कराना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कमिश्नर की रिपोर्ट से किसी भी पक्ष का कोई मौलिक (Substantive) अधिकार न तो बनता है और न ही समाप्त होता है।

    जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आदेश 39 नियम 7 CPC के तहत स्थानीय निरीक्षण (Local Inspection) के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी।

    मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि प्रतिवादी ने उसकी भूमि पर अतिक्रमण किया है। उसने स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) और अंतरिम निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) की मांग की थी, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने अंतरिम संरक्षण भी प्रदान किया था।

    इसके बाद प्रतिवादी ने आदेश 39 नियम 7 CPC के तहत आवेदन दायर कर विवादित संपत्ति की मौजूदा स्थिति, माप, सीमाएं और भौतिक स्वरूप का निरीक्षण कराने की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने यह आवेदन स्वीकार करते हुए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर दिया।

    याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि कमिश्नर की नियुक्ति के माध्यम से प्रतिवादी अदालत की सहायता से अपने पक्ष में साक्ष्य एकत्र करना चाहता है, जबकि कब्जा, सीमाएं और माप जैसे तथ्य ट्रायल के दौरान स्वतंत्र साक्ष्यों से साबित किए जाने चाहिए।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि विवाद संपत्ति की मौजूदा भौतिक स्थिति से संबंधित था और अंतरिम निषेधाज्ञा पर प्रभावी निर्णय लेने के लिए वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन आवश्यक था। इसलिए स्थानीय निरीक्षण के लिए कमिश्नर की नियुक्ति पूरी तरह न्यायसंगत थी।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि कमिश्नर की रिपोर्ट केवल अदालत को तथ्यों को समझने में सहायता करती है। इससे किसी पक्ष के अधिकार तय नहीं होते और न ही पक्षकारों की यह जिम्मेदारी समाप्त होती है कि वे ट्रायल के दौरान स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर अपना मामला सिद्ध करें।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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