राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति को चुनौती देने वाली PIL खारिज की, ₹1 लाख का जुर्माना लगाया

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति को चुनौती देने वाली PIL खारिज की, ₹1 लाख का जुर्माना लगाया

    राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर स्थित 'सरदार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ पुलिस, सिक्योरिटी एंड क्रिमिनल जस्टिस' के कुलपति की नियुक्ति से जुड़े प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। साथ ही, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया।

    जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने पाया कि यह जनहित याचिका कुलपति से अपना निजी हिसाब बराबर करने के लिए दायर की गई, क्योंकि याचिकाकर्ता के मन में उनके प्रति निजी रंजिश थी। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ चल रहे या पहले से तय हो चुके आपराधिक, दीवानी (सिविल) और राजस्व मामलों के बारे में जरूरी जानकारी छिपाई थी।

    हालांकि कोर्ट ने किसी उपयुक्त मामले में संवैधानिक चुनौती पर विचार करने का विकल्प खुला रखा है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसे सतर्क रहना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई व्यक्ति गलत इरादों या अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग न करे।

    कोर्ट ने कहा,

    "जनहित याचिका (PIL) का उद्देश्य सार्वजनिक न्याय को बढ़ावा देना है। इसे निजी विवादों को सुलझाने, अपनी निजी शिकायतों को दूर करने या विरोधियों को झुकाने का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। यह न तो निजी रंजिश निकालने की जगह है और न ही सार्वजनिक हित के नाम पर किसी व्यक्ति से बदला लेने का कोई साधन है।"

    बता दें, याचिकाकर्ता 'सरदार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ पुलिस' में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर काम कर रहे थे। उन्होंने कुलपति की नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी थी कि संबंधित व्यक्ति के पास यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) रेगुलेशंस, 2018 के तहत तय की गई जरूरी योग्यताएं नहीं थीं।

    इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने 'सरदार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ पुलिस, सिक्योरिटी एंड क्रिमिनल जस्टिस, जोधपुर एक्ट, 2012' की धारा 11(1) की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी थी, जो चांसलर (कुलाधिपति) को कुलपति नियुक्त करने का अधिकार देती है।

    याचिकाकर्ता की दलील थी कि इस प्रावधान में कुलपति की नियुक्ति के लिए कोई पात्रता मानदंड (Eligibility Criteria) तय नहीं किया गया, जो UGC रेगुलेशंस, 2018 का उल्लंघन है और चांसलर को बिना किसी स्पष्ट दिशा-निर्देश के असीमित विवेकाधिकार (Unfettered Discretion) देता है। इसके विपरीत, राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता ने 'राजस्थान हाईकोर्ट नियम, 1952' में निर्धारित आवश्यकताओं का पालन किए बिना यह जनहित याचिका (PIL) दायर की। इन नियमों के तहत लंबित मामलों सहित अन्य जरूरी जानकारियों का खुलासा करना अनिवार्य है। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कई दीवानी (सिविल) और आपराधिक मामले लंबित थे, जिन्हें उसने छिपा लिया था।

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड देखने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के मन में प्रतिवादी (Respondent) के प्रति कुछ निजी रंजिशें और शिकायतें थीं, जिन्हें उसने इस जनहित याचिका की आड़ में पेश किया।

    पता चला कि जब याचिकाकर्ता सहायक प्रोफेसर के रूप में काम कर रहा था और संबंधित प्रतिवादी कुलपति (Vice Chancellor) के रूप में अपना पहला कार्यकाल पूरा कर रहे थे, तब प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक शिकायतें दर्ज कराई थीं और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की थी। यह कार्रवाई IPC, POSH और 'राजस्थान लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 1992' के तहत की गई थी।

    अदालत ने गौर किया कि 2020-2023 के दौरान, याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी की नियुक्ति को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई। जब प्रतिवादी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू हुई और बाद में उनकी फिर से नियुक्ति हुई, तब 2024 में यह जनहित याचिका दायर की गई—जिसका मकसद केवल अपना पुराना हिसाब बराबर करना था।

    अदालत ने माना कि यदि याचिकाकर्ता वास्तव में जनहित के उद्देश्य से काम कर रहा होता तो उसे प्रतिवादी की शुरुआती नियुक्ति के समय ही अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। लेकिन, घटनाओं का क्रम यह साफ दिखाता है कि यह मुकदमा असल में निजी बदला लेने की एक कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है।

    आगे कहा गया,

    “किसी सच्चे जनहित के मुद्दे का इस्तेमाल ऐसी आड़ के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, जिसके पीछे व्यक्तिगत द्वेष, निजी स्वार्थ, निहित स्वार्थ या केवल प्रचार पाने की मंशा छिपी हो... इसलिए जनहित याचिका (PIL) की वैधता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसमें किस तरह की राहत मांगी गई, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि याचिका दायर करने वाले व्यक्ति की नीयत कितनी साफ है, उसकी विश्वसनीयता क्या है और क्या वह सच में जनहित की भावना से प्रेरित है।”

    इसके अलावा, कोर्ट ने 1952 के नियमों के नियम 385-F (7) का हवाला दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता के लिए अपने आपराधिक इतिहास (criminal antecedents) का खुलासा करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर अपने खिलाफ चल रहे या पहले से तय हो चुके मामलों की जानकारी छिपाई है।

    कोर्ट ने कहा,

    “ऊपर की गई चर्चाओं को देखते हुए याचिकाकर्ता का आचरण उसे इस बात का हकदार नहीं बनाता कि वह जनहित याचिका के जरिए इन नियमों की वैधता पर कोई सवाल उठाए।”

    इस पृष्ठभूमि में, कोर्ट ने माना कि जनहित याचिका में उठाए गए उस सवाल की जांच करना उचित नहीं है, जो किसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है।

    तदनुसार, जनहित याचिका खारिज की गई और याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसे राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (Rajasthan State Legal Services Authority) के पास जमा करना होगा।

    Case Title : Vijay Singh Sheron v State of Rajasthan & Ors

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