CrPC की धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देने के बाद कोर्ट 'फंक्टस ऑफिसियो' नहीं हो जाता, उसे प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगनी चाहिए: राजस्थान हाईकोर्ट

Shahadat

11 Jun 2026 9:04 PM IST

  • CrPC की धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देने के बाद कोर्ट फंक्टस ऑफिसियो नहीं हो जाता, उसे प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगनी चाहिए: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब क्रिमिनल कोर्ट ने CrPC की धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश दे दिया तो वह 'फंक्टस ऑफिसियो' (यानी अपना काम पूरा करके अधिकार-मुक्त) नहीं हो जाता। अगर कोर्ट को लगता है कि जांच उचित समय में पूरी नहीं हुई तो उससे प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगना उसकी ज़िम्मेदारी बनी रहती है।

    जस्टिस रेखा बोराना की बेंच ने देखा कि कोर्ट के सामने ऐसे कई मामले आए, जिनमें ट्रायल कोर्ट के सामने कार्यवाही सालों तक लंबित रहती है, जबकि जांच एजेंसी से प्रभावी स्थिति/प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगने के लिए बार-बार तारीखें तय की जाती रहती हैं।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस कोर्ट के सामने ऐसी कई रिट याचिकाएं आईं, जो केवल इसलिए दायर की गईं, क्योंकि मजिस्ट्रेट द्वारा CrPC की धारा 156(3) [BNSS की धारा 175(3)] के तहत पारित आदेश के अनुसार जांच करने के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। देखा गया कि ऐसे सभी मामलों में मजिस्ट्रेट के जांच करने और अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद, न तो जांच उचित समय में पूरी होती है और न ही लंबे समय तक प्रोग्रेस रिपोर्ट दाखिल की जाती है। इस कोर्ट ने देखा कि ऐसे कई मामलों में ट्रायल कोर्ट के सामने कार्यवाही सालों तक लंबित रहती है, जबकि जांच एजेंसी से प्रभावी स्थिति/प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगने के लिए बार-बार तारीखें तय की जाती रहती हैं। नतीजतन, वादी असाधारण अधिकार क्षेत्र के तहत इस कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और आदेशों के कार्यान्वयन की मांग करते हैं, जो असल में संबंधित क्रिमिनल कोर्ट के पर्यवेक्षण के दायरे में आते हैं।

    यह कोर्ट यह कहने के लिए मजबूर है कि CrPC की धारा 156(3) के तहत क्रिमिनल कोर्ट द्वारा जांच का आदेश जारी किए जाने के बाद वह 'फंक्टस ऑफिसियो' नहीं हो जाता कि बस बार-बार ऑर्डर-शीट में यह लिखता रहे कि प्रोग्रेस/अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।"

    बता दें, कोर्ट एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें प्रतिवादी-पुलिस अधिकारियों को उचित समय के भीतर जांच पूरी करने और रिपोर्ट जमा करने का निर्देश देने की मांग की गई। ट्रायल कोर्ट ने अप्रैल 2025 में सर्कल ऑफिसर को जांच करने और मई 2025 में फाइनल रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। ऐसे निर्देश के बावजूद, एक साल बीत जाने के बाद भी इस मामले में कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई। इसलिए यह याचिका दायर की गई।

    कोर्ट ने देखा कि उसके सामने ऐसी कई याचिकाएं आई हैं, जो केवल इसलिए दायर की गईं, क्योंकि मजिस्ट्रेट द्वारा CrPC की धारा 156(3) के तहत जांच करने के लिए जारी निर्देशों का पालन नहीं किया गया।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रॉबर्ट लालचुंगनुंगा चोंगथु उर्फ ​​आर.एल. चोंगथु बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया कि हालांकि CrPC में कोई सख्त समय-सीमा निर्धारित नहीं है, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि जांच उचित समय में पूरी हो।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    "कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यदि कोर्ट को लगता है कि FIR और फाइनल चार्ज-शीट के बीच लंबा अंतराल है तो वह जांच एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगने और दिए गए स्पष्टीकरण की उचितता से खुद को संतुष्ट करने के लिए बाध्य है।"

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने माना कि CrPC की धारा 156(3) के तहत मामले को जांच के लिए जांच एजेंसी को भेजने के बाद मजिस्ट्रेट/आपराधिक अदालत की जिम्मेदारियां खत्म नहीं हो जातीं।

    कोर्ट ने कहा,

    "कोर्ट का यह भी दायित्व है कि वह उक्त जांच की निगरानी और देखरेख करे। यदि उसे लगता है कि जांच उचित समय के भीतर पूरी नहीं हुई है या उसमें अनावश्यक देरी हो रही है तो वह प्रगति रिपोर्ट मांगने के लिए बाध्य है। जांच एजेंसी बिना किसी तार्किक निष्कर्ष के वर्षों तक जांच को लटकाए नहीं रख सकती। ऐसा करने से न केवल पीड़ित/शिकायतकर्ता के अधिकारों में बाधा आती है, बल्कि आरोपी के अधिकारों पर भी असर पड़ता है।"

    इसके अनुसार, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि इस मामले में जांच अधिकारी द्वारा 6 सप्ताह के भीतर फाइनल जांच रिपोर्ट/चार्ज-शीट/फाइनल रिपोर्ट दाखिल की जाए। ऐसा न होने पर ट्रायल कोर्ट दोषी अधिकारी के खिलाफ उचित आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र होगा।

    इसके साथ ही याचिका का निपटारा किया गया।

    Title: Sumann Mundhara v State of Rajasthan & Ors.

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