'आटा-साटा' शादियां नैतिक और कानूनी रूप से दिवालिया हैं, बच्ची को सौदेबाजी का ज़रिया बनाया जाता है: राजस्थान हाईकोर्ट
Shahadat
17 May 2026 10:30 PM IST

तलाक की खारिज अर्जी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने "आटा-साटा" शादी की प्रचलित प्रथा के बारे में कुछ टिप्पणियां करते हुए राय दीं कि एक संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसी प्रथाएं स्पष्ट सामाजिक और कानूनी अस्वीकृति की हकदार हैं।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की डिवीज़न बेंच ने माना कि नाबालिग से जुड़ा आटा-साटा कोई हानिरहित सांस्कृतिक प्रथा नहीं है, बल्कि यह बच्चों को वस्तु बना देती है, उनकी सहमति को दबा देती है, पितृसत्ता को मज़बूत करती है और भविष्य के टकरावों का रास्ता खोलती है।
उन्होंने कहा,
"समुदाय कानून को दरकिनार करने के लिए रीति-रिवाजों का सहारा नहीं ले सकते। कोई भी सामाजिक प्रथा उस चीज़ को वैध नहीं ठहरा सकती जिसे कानून प्रतिबंधित और निंदित करता है।"
बता दें, आटा-साटा शादी एक पारंपरिक आपसी शादी की प्रणाली है, जिसमें एक परिवार में शादी के दौरान, छोटे बच्चों—आमतौर पर एक बच्ची—की भविष्य की शादी उन्हीं परिवारों के बीच अनौपचारिक रूप से तय कर दी जाती है, और जब बच्ची कानूनी उम्र की हो जाती है तो इस व्यवस्था को बाद में एक वास्तविक शादी में बदल दिया जाता है।
भारत में बाल विवाह पर प्रतिबंध को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब शादियां परिवारों के बीच आपसी लेन-देन के रूप में तय की जाती हैं, जिसमें नाबालिग शामिल होते हैं तो रीति-रिवाज एक दमनकारी सामाजिक तंत्र बन जाते हैं, जहाँ बच्चों—विशेष रूप से बच्चियों—का इस्तेमाल परिवारों के बीच वैवाहिक सौदेबाजी और मोलभाव के ज़रिया के रूप में किया जाता है।
कोर्ट ने कहा,
"कोई भी रीति-रिवाज जो किसी बच्ची को सिर्फ इसलिए शादी करने के लिए मजबूर करता है, क्योंकि कोई दूसरी शादी हुई है, वह अपने आप में नैतिक रूप से दिवालिया है। इससे भी कहीं ज़्यादा बुरा वह चलन है, जो किसी नाबालिग को ऐसी व्यवस्था में बाँध देता है। ऐसा रीति-रिवाज पूरी तरह से बचाव के लायक नहीं है। शोषण को सांस्कृतिक भाषा का जामा पहनाने से वह पवित्र नहीं हो जाता। एक बच्ची किसी आपसी सौदेबाजी में कोई प्रतिफल (कीमत) नहीं है। एक बेटी किसी दूसरे बेटे की शादी के लिए कोई ज़मानत नहीं है। बचपन से ही ज़बरदस्ती की गई मानसिक तैयारी के बाद बालिग होने पर दी गई सहमति को 'स्वतंत्र सहमति' नहीं माना जा सकता।"
इस प्रथा की कड़ी निंदा करते हुए कोर्ट ने कहा:
"संक्षेप में कहें तो, जिसमें कोई नाबालिग शामिल हो, ऐसा 'आटा-साटा' कोई हानिरहित सांस्कृतिक प्रथा नहीं है। यह बच्चों को एक वस्तु बना देती है, उनकी सहमति को दबाती है, पितृसत्ता को मज़बूत करती है, और भविष्य में होने वाले झगड़ों को जन्म देती है। नाबालिग का बालिग होने पर ऐसी शादी को मानने से इनकार करने का अधिकार ही काफी नहीं है। असली समस्या तो वह व्यवस्था है जो यह मानकर चलती है कि किसी बच्चे को शुरू से ही किसी बंधन में बांधा जा सकता है। किसी नाबालिग को शामिल करने वाला 'आटा-साटा' असल में लैंगिक ज़बरदस्ती, बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन और परिवार द्वारा की जाने वाली ज़बरदस्ती की ऐसी व्यवस्था है, जिसे रीति-रिवाज़ का चोला पहना दिया गया। कानून के राज पर चलने वाले एक संवैधानिक लोकतंत्र में, ऐसी प्रथाओं को समाज और कानून, दोनों ही स्तरों पर पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए।"
कोर्ट, फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा दायर तलाक की अर्जी खारिज की गई थी।
तलाक मांगने के आधार के तौर पर अपीलकर्ता ने अपने साथ हुई क्रूरता, उत्पीड़न, लगातार दहेज की मांग, ससुराल से ज़बरदस्ती निकाले जाने और इन सब कारणों से पति (प्रतिवादी) के साथ मिलकर रहने का कोई भी रास्ता न बचने की दलीलें दी थीं।
इसके विपरीत, सभी आरोपों को नकारते हुए प्रतिवादी ने बताया कि उनकी शादी 'आटा-साटा' प्रथा के तहत हुई थी; जिसके अनुसार, उनकी शादी के समय ही प्रतिवादी की बहन की शादी भी अपीलकर्ता के भाई के साथ तय कर दी गई।
प्रतिवादी ने बताया कि दोनों परिवारों के बीच झगड़ा तब शुरू हुआ, जब प्रतिवादी की बहन ने बालिग होने पर अपीलकर्ता के भाई के साथ अपने वैवाहिक रिश्ते को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। यह तर्क दिया गया कि इस बात से नाराज़ होकर अपीलकर्ता ने बदले की भावना से खुद ही उसे (पति को) छोड़ दिया था।
दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उनके भाई-बहनों के बीच हुई 'आटा-साटा' शादी का टूट जाना ही, अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए इस कदम का एकमात्र कारण नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने यह फैसला दिया कि अपीलकर्ता इस बात को साबित करने में सफल रही कि उसे अपने ससुराल में कई सालों तक वैवाहिक क्रूरता का सामना करना पड़ा था। इसलिए कोर्ट ने तलाक की मंज़ूरी दे दी।
अदालत ने 'आटा-सट्टा' की प्रथा पर नाराज़गी ज़ाहिर की और मौजूदा मामले पर विचार करते हुए कहा,
“एक बच्ची, जिसमें न तो समझदारी थी और न ही कोई कानूनी हैसियत, उसे शादी के बंधन में इसलिए नहीं बांधा गया कि उसकी अपनी मर्ज़ी थी, बल्कि इसलिए बांधा गया, क्योंकि उसके आस-पास के बड़ों ने उसकी ज़िंदगी से जुड़े पारिवारिक मामलों को अपने हिसाब से तय करने का फ़ैसला किया। सिर्फ़ यही एक बात इस प्रथा के नैतिक और कानूनी दिवालियेपन को उजागर करने के लिए काफ़ी है... हम यह भी कहना चाहेंगे कि जैसा कि सामने आया है, ज़्यादातर मामलों में लड़कियों को अधिकारों वाली इंसान के बजाय, एक ऐसी ज़िम्मेदारी के तौर पर देखा जाता है, जिसे एक जगह से दूसरी जगह 'ट्रांसफ़र' किया जा सकता है।”
आगे यह भी राय दी गई कि इस प्रथा के बारे में सबसे दुखद बात यह थी कि हर शादी अपने आप में एक अलग पहचान रखने के बजाय दोनों शादियों की किस्मत एक-दूसरे से जुड़ी होती थी। अगर एक शादी टूट जाती थी, तो दूसरे परिवार में भी उसका बदला लिया जाता था।
अदालत ने फ़ैसला दिया कि इस तरह का ढांचा बुनियादी तौर पर अन्यायपूर्ण था।
Title: Kiran Bishnoi v Sunil Kumar

