S.528 BNSS | हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल छिपी हुई दूसरी रिविज़न के तौर पर नहीं किया जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
Shahadat
29 Sept 2026 1:47 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि सेशंस कोर्ट के रिविज़न ऑर्डर के खिलाफ हाईकोर्ट की इनहेरेंट पावर्स (अंतर्निहित शक्तियों) का इस्तेमाल करने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका बहुत ही सीमित दायरे में काम करती है। याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि न्याय में भारी चूक हुई या अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) में कोई बड़ी गड़बड़ी है।
जस्टिस सुमीत गोयल ने सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की, जिसमें रिसीवर को कैथल जिले में लगभग 514 कनाल ज़मीन समाधि को सौंपने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने 1970 में हुए 99 साल के लीज़ एग्रीमेंट के आधार पर ज़मीन पर अपना दावा किया।
आगे कहा गया,
"जब सेशंस कोर्ट पहले ही रिविज़न ज्यूरिस्डिक्शन के ज़रिए किसी आदेश की सही-गलत होने की जांच कर चुका हो - और अपनी समीक्षा को साफ तौर पर गैर-कानूनी बातों, प्रक्रियात्मक गड़बड़ियों या न्याय में स्पष्ट चूक को सुधारने तक ही सीमित रखता हो - तो BNSS की धारा 528 के तहत याचिका असल में छिपी हुई दूसरी रिविज़न बन जाती है। प्रक्रियात्मक कानून (BNSS) के तहत इसकी मनाही है। इसलिए ऐसे मामलों में हाईकोर्ट के दखल के लिए याचिकाकर्ता पर यह साबित करने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है कि न्याय में भारी चूक हुई है या अधिकार क्षेत्र में कोई बड़ी गड़बड़ी है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"यह संयम तब और भी अहम हो जाता है, जब पार्टियों के बीच विवाद तथ्यों के पेचीदा और विवादित सवालों पर टिका हो - जैसे कब्ज़ा, मालिकाना हक, और लीज़-डीड का कानूनी मतलब या असर - जो समरी प्रोसीडिंग्स (संक्षिप्त कार्यवाही) के दायरे से बाहर की बातें हैं।"
यह विवाद कैथल जिले के गोहाना गांव में लगभग 514 कनाल 6 मरला ज़मीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता 06.06.1970 की रजिस्टर्ड लीज़-डीड के तहत अधिकार का दावा करते हैं। कहा जाता है कि यह डीड समाधि बाबा निहाल गिर के मोहतमिम ने 1971 से 2070 तक, यानी 99 साल के लिए ₹60,000 में की थी। उन्होंने लगातार खेती करने और कब्ज़ा होने का सबूत देने के लिए 1972 के म्यूटेशन और बाद की जमाबंदी (अधिकारों का रिकॉर्ड) और खसरा गिरदावरी (कब्ज़े का रिकॉर्ड) का सहारा लिया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्हें 2008 में पता चला कि गिरदावरी की एंट्रीज़ (कब्ज़े का रिकॉर्ड) समाधि के पक्ष में बदल दी गईं। बाद में असिस्टेंट कलेक्टर (फर्स्ट ग्रेड) ने एंट्रीज़ को उनके पक्ष में ठीक किया, लेकिन अपील के बाद मामले को वापस भेज दिया गया और यह अभी भी लंबित है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि प्रतिवादियों ने 18.05.2015 को ज़बरदस्ती कब्ज़ा करने की कोशिश की। उन्होंने रोक (इंजंक्शन) के लिए एक सिविल केस दायर किया। निजी प्रतिवादियों ने CrPC की धारा 145 और 146 के तहत कार्यवाही शुरू की। 01.06.2015 को, SDM कैथल ने ज़मीन को अटैच किया और नायब तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया। 11.12.2017 को, एडिशनल सेशंस जज ने इस आदेश को रद्द किया, क्योंकि मजिस्ट्रेट ने धारा 145 के तहत ज़रूरी संतुष्टि दर्ज नहीं की।
निजी प्रतिवादियों की नई अर्ज़ी पर SDM ने 04.01.2018 के आदेश से रिसीवर को निर्देश दिया कि वह समाधि बाबा निहाल गिर को उसके महंत के माध्यम से कब्ज़ा सौंप दे। एडिशनल सेशंस जज, कैथल ने 26.07.2024 को याचिकाकर्ताओं की रिविज़न याचिका खारिज की। उन्होंने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं का सिविल केस 29.08.2015 को और उनकी अपील 10.01.2023 को खारिज की गई और हाईकोर्ट में रेगुलर सेकंड अपील लंबित है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि SDM ने लीज़-डीड, रेवेन्यू एंट्रीज़ या रेवेन्यू अधिकारियों की उन रिपोर्टों पर ठीक से विचार नहीं किया, जो उनके लगातार कब्ज़े को दिखाती थीं। उन्होंने कहा कि उन्हें कानून के अनुसार ही कब्ज़े से हटाया जा सकता है।
यह तर्क दिया गया कि चूंकि 2015 का अटैचमेंट आदेश रद्द कर दिया गया, इसलिए कब्ज़ा सौंपने का बाद का आदेश टिकने लायक नहीं था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 2070 तक चलने वाली मौजूदा लीज़ के तहत उनके अधिकारों को CrPC की धारा 145 और 146 के तहत कार्यवाही करके खत्म नहीं किया जा सकता।
राज्य ने कहा कि यह विवाद मूल रूप से निजी था और निजी प्रतिवादियों के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि SDM के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कोई गलती नहीं थी। उन्होंने कहा कि सिविल कोर्ट पहले ही याचिकाकर्ताओं के खिलाफ विवाद का फैसला कर चुका था, और रिविजनल कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड और सिविल कोर्ट के फैसले पर विचार किया।
Case Title: Rampal and Others v. State of Haryana and Others

