जेल में ड्रग्स बेचने का मामला: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने आरोपी पुलिसकर्मी के खिलाफ़ ट्रायल पर लगाई रोक
Shahadat
11 July 2026 9:44 AM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बठिंडा सेंट्रल जेल में सिक्योरिटी ड्यूटी पर तैनात एक कॉन्स्टेबल के खिलाफ़ ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाई। उस पर जेल में ड्रग्स बेचने के आरोप में NDPS Act, 1985 और प्रिज़न्स एक्ट, 1894 की धारा 52 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।
जस्टिस रमेश चंद्र डिमरी ने पुलिसकर्मी की उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें FIR, फाइनल रिपोर्ट और उससे जुड़े आदेशों को रद्द करने की मांग की गई।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"नोटिस का जवाब 09.09.2026 तक आना चाहिए। इस बीच ट्रायल कोर्ट के सामने आगे की कार्यवाही रुकी रहेगी।"
अभियोजन पक्ष का मामला एक गुप्त सूचना पर आधारित था, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने पैसे के बदले कुछ विचाराधीन कैदियों को नशीले पदार्थ सप्लाई करने में मदद की थी। आरोप था कि याचिकाकर्ता की माँ के बैंक अकाउंट से जुड़े मोबाइल नंबर पर UPI के ज़रिए ₹77,000 ट्रांसफर किए गए और याचिकाकर्ता ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कबूल किया।
हालांकि, पुलिसकर्मी की याचिका के अनुसार, जांच ने ही अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर कर दिया। जांच एजेंसी ने UPI ट्रांज़ैक्शन का पता लगाया और पैसे ट्रांसफर करने वाले व्यक्ति, सुखमनबीर सिंह का बयान दर्ज किया। उसने बताया कि ₹77,000 विचाराधीन कैदी जोबनजीत सिंह के कहने पर सिर्फ़ कपड़े खरीदने के लिए भेजे गए, न कि कोई नशीला पदार्थ खरीदने के लिए।
याचिका में कहा गया कि पुलिस को ट्रांज़ैक्शन को नशीले पदार्थों या साइकोट्रोपिक पदार्थों की सप्लाई से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं मिला। साथ ही फाइनल रिपोर्ट में विचाराधीन कैदियों जोबनजीत सिंह और लोकेश जैन की कथित भूमिका का सिर्फ़ सतही तौर पर ज़िक्र किया गया, और याचिकाकर्ता के खिलाफ़ दर्ज किसी भी स्वीकार्य बयान से इसका समर्थन नहीं मिला।
याचिकाकर्ता ने अभियोजन पक्ष की कार्यवाही की वैधता को ही चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि NDPS Act की धारा 59(3) के तहत कोई भी कोर्ट धारा 59(2) के तहत दंडनीय अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक कि केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व मंज़ूरी से शिकायत न की गई हो।
यह तर्क दिया गया कि इस ज़रूरी शर्त के बावजूद, पुलिस ने मंज़ूरी वाली शिकायत के बजाय BNSS की धारा 193 (जो CrPC की धारा 173(2) के बराबर है) के तहत फ़ाइनल रिपोर्ट दायर की। इससे स्पेशल कोर्ट द्वारा मामले का संज्ञान लेना और उसके बाद आरोप तय करना अधिकार-क्षेत्र से बाहर हो गया।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि प्रिज़न्स एक्ट की धारा 52 के तहत तय किया गया आरोप भी टिकने लायक नहीं था, क्योंकि यह प्रावधान जेल सुपरिटेंडेंट को केवल यह अधिकार देता है कि वह किसी कैदी को ट्रायल के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजे, जब विभागीय सज़ा को अपर्याप्त माना जाए। इस मामले में इस प्रक्रिया का पालन कभी नहीं किया गया और किसी भी स्थिति में धारा 52 के तहत अपराध के लिए कोई FIR दर्ज नहीं की जा सकती।
इसके अलावा यह तर्क दिया गया कि धारा 52 का प्रावधान एक ही काम के लिए दोहरी सज़ा पर रोक लगाता है, जिससे NDPS Act के तहत उन्हीं आरोपों पर कार्यवाही शुरू होने के बाद प्रिज़न्स एक्ट के तहत समानांतर मुक़दमा चलाना मंज़ूर नहीं है।
Title: JASKARAN SINGH VS STATE OF PUNJAB


