आय छिपाने पर पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण, धारा 125 CrPC के तहत दावा खारिज: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

  • आय छिपाने पर पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण, धारा 125 CrPC के तहत दावा खारिज: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग को खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी नौकरी, आय और वित्तीय संपत्तियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां जानबूझकर छिपाईं, इसलिए वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

    जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को दरिद्रता व बेसहारा स्थिति से बचाना है और यह केवल उन्हीं मामलों में लागू होती है, जहां महिला स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो। ऐसे में याचिकाकर्ता पर यह दायित्व था कि वह यह साबित करे कि वह स्वयं और अपने बच्चे का पालन-पोषण करने में असमर्थ है। हालांकि, वर्तमान मामले में उसने अपनी नौकरी और आय को छिपाया और पति की आय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।

    कोर्ट ने आगे कहा कि जब कोई व्यक्ति न्यायालय का रुख करता है, तो उसे “स्वच्छ हाथों, स्वच्छ मन, स्वच्छ हृदय और स्वच्छ उद्देश्य” के साथ आना चाहिए। कोई भी वादी अदालत के समय और सार्वजनिक धन का दुरुपयोग अपने हित साधने के लिए नहीं कर सकता।

    यह याचिका फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें पत्नी की भरण-पोषण की अर्जी खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि फैमिली कोर्ट ने गलत निष्कर्ष निकाला कि उसने अपनी नौकरी और आर्थिक स्थिति से जुड़े तथ्यों को दबाया है। यह भी दलील दी गई कि उसकी आय पर्याप्त नहीं है और वह अपने पिता पर निर्भर है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की जांच के बाद इन दलीलों में कोई दम नहीं पाया। कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने यह दावा किया था कि उसने अपनी सगी बहन की बेटी को गोद लिया है, लेकिन जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि पति ने इस गोद लेने के लिए कभी सहमति नहीं दी। इसके अलावा, कथित गोद लेने के समर्थन में कोई दस्तावेज, रस्म या आधिकारिक रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किया गया। कोर्ट ने इसे सहानुभूति हासिल करने के लिए किया गया दुर्भावनापूर्ण प्रयास करार दिया।

    महत्वपूर्ण रूप से, याचिकाकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि उसके पास किसान विकास पत्र (KVP) और पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) खाते हैं, जिनमें ₹15 लाख से अधिक की राशि जमा है, साथ ही अन्य बैंक खाते भी हैं। उसने यह भी माना कि उसका एक्सिस बैंक में एक अलग सैलरी अकाउंट है, लेकिन उसने उसका बैलेंस बताने या संबंधित दस्तावेज पेश करने से परहेज किया।

    कोर्ट ने कहा— दरिद्रता का कोई मामला नहीं बनता

    हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता 5 जुलाई 2019 से अलग रह रही है और इस अवधि में उसने किसी भी प्रकार की गंभीर आर्थिक तंगी साबित नहीं की। वह B.Ed., M.A. (हिंदी) और M.A. (आर्ट एंड क्राफ्ट) जैसी उच्च योग्यताएं रखती है और लगातार रोजगार में रही है।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे पर भी संदेह जताया कि उसकी आय ₹18,000 प्रतिमाह से घटकर ₹12,200 रह गई है। इसे न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग और पति को परेशान करने का प्रयास बताया गया।

    भरण-पोषण अनुचित समृद्धि का साधन नहीं

    धारा 125 CrPC के उद्देश्य पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान दरिद्रता और बेसहारा स्थिति से बचाव के लिए है, न कि अनुचित समृद्धि (unjust enrichment) का माध्यम। कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े निरर्थक और झूठे मुकदमों की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे न केवल कानून का उद्देश्य विफल होता है, बल्कि “महिला की गरिमा और आत्मनिर्भरता” भी प्रभावित होती है।

    इन सभी तथ्यों के मद्देनज़र हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और याचिका को खारिज कर

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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