ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान से जुड़े जासूसी आरोपों में आरोपी को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत

Praveen Mishra

9 April 2026 3:26 PM IST

  • ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान से जुड़े जासूसी आरोपों में आरोपी को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पाकिस्तान से जुड़ी कथित जासूसी गतिविधियों के आरोपों वाले मामले में दविंदर सिंह उर्फ़ देवेंद्र सिंह को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए खुलासे के बयान (डिस्क्लोजर स्टेटमेंट) के अलावा कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संवेदनशील जानकारी के प्रसारण का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होने की स्थिति में आरोपी को लगातार हिरासत में रखना उचित नहीं है।

    यह याचिका नियमित जमानत के लिए दायर की गई थी, जिसकी सुनवाई जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज कर रहे थे। संबंधित एफआईआर भारतीय न्याय संहिता और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत दर्ज की गई थी। यह एफआईआर एक पुराने आर्म्स एक्ट मामले की जांच के दौरान दिए गए खुलासे के बयान के आधार पर दर्ज हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता नवंबर 2024 में पाकिस्तान गया था, वहां कुछ व्यक्तियों से संपर्क स्थापित किया और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भारतीय सेना की गतिविधियों से संबंधित जानकारी साझा की।

    याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष दलील दी कि वह केवल तीर्थ यात्रा के लिए पाकिस्तान गया था और गुरुद्वारा परिसर तक ही सीमित रहा। उसने यह भी कहा कि उसके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है और पूरा मामला केवल कथित खुलासे के बयान पर आधारित है। वहीं, राज्य ने दावा किया कि याचिकाकर्ता पाकिस्तान में कुछ व्यक्तियों के संपर्क में था और उसने संवेदनशील जानकारी साझा की।

    अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करते हुए पाया कि खुलासे के बयान के अलावा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने किसी को कोई जानकारी, वीडियो या फोटो भेजी या साझा की हो। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य से कई महत्वपूर्ण सवाल भी किए, जैसे कि एकत्रित सामग्री की प्रकृति, कथित संपर्क की अवधि, उसे खुफिया एजेंसियों से जोड़ने का आधार, और जानकारी साझा करने के प्रमाण। राज्य इन सवालों के संतोषजनक उत्तर देने में असफल रहा।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के मोबाइल में मिले कथित वीडियो के समय और प्रकृति को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है, और यह भी साबित नहीं हुआ कि उसे किसी के साथ साझा किया गया। साथ ही, यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, सिवाय वर्तमान एफआईआर और पहले के आर्म्स एक्ट मामले के।

    ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत कार्यवाही के संबंध में अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार से आवश्यक स्वीकृति (सैंक्शन) अब तक प्राप्त नहीं हुई है, जिसके बिना ट्रायल शुरू नहीं किया जा सकता।

    इन सभी परिस्थितियों—आरोपों की प्रकृति, ठोस साक्ष्य का अभाव, हिरासत की अवधि, साफ आपराधिक रिकॉर्ड, और ट्रायल शुरू न हो पाने—को ध्यान में रखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता जमानत का हकदार है।

    अतः हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को नियमित जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया, साथ ही शर्त लगाई कि वह गवाहों को प्रभावित या धमकाने का प्रयास नहीं करेगा।

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