जुर्माना न भरने पर जेल की सज़ा, बकाया रकम के अनुपात में होनी चाहिए: NI Act मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
Shahadat
21 May 2026 2:56 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के मामले में दोषी की सज़ा घटाकर उतनी की, जितनी वह पहले ही काट चुका है, जबकि शिकायतकर्ता को दी जाने वाली मुआवज़े की रकम बढ़ा दी। कोर्ट ने इस सिद्धांत पर ज़ोर दिया कि जब पैसे के बकाया का भुगतान न करने पर जेल की सज़ा दी जाती है तो "आज़ादी की कीमत भी अनुपात में होनी चाहिए।"
जस्टिस अनूप चितकारा ने कहा,
"आपराधिक न्यायशास्त्र में एक मुख्य सैद्धांतिक चिंता के तौर पर जो मूल सिद्धांत उभरा है, वह यह है कि जुर्माना/मुआवज़े की रकम न भरने के कारण जेल में बंद होने से अपनी आज़ादी छिन जाने की कीमत दोषी को कितनी चुकानी पड़ती है। पैसे न दे पाने की असमर्थता के लिए दोषी को हर दिन अपने शरीर का कितना हिस्सा (कितनी तकलीफ़) चुकानी पड़ती है? यह कार्यपालिका का काम था कि वह आनुपातिक सज़ा के लिए कानून बनाती, और उसकी गैर-मौजूदगी में, हाई कोर्ट - जो किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का मुख्य संरक्षक है - गहरी नींद के खोल में बंद नहीं रह सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा कि आनुपातिक सज़ा के बीज अब अंकुरित हो चुके हैं। इसकी हरी कोंपलें हर क्षेत्राधिकार में दिखाई दे रही हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत परिकल्पित समानता और समता के सिद्धांत को सार्थक बनाने के लिए, जुर्माना और मुआवज़ा न भरने पर दोषी को जितनी जेल की सज़ा काटनी पड़ती है, वह बकाया रकम के बराबर होनी चाहिए और वैसे ही मामलों में अन्य दोषियों को दी गई सज़ा के अनुरूप होनी चाहिए। आज़ादी की कीमत अनुपात में होनी चाहिए।
यह मामला ₹3.80 लाख के चेक के अनादरण (बाउंस होने) से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 2024 के अपने फैसले में याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया और एक साल की जेल की सज़ा के साथ ₹5.70 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। अपीलीय अदालत ने जनवरी 2026 में इन निष्कर्षों की पुष्टि की।
हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने अपनी दोषसिद्धि पर कोई विवाद नहीं किया, बल्कि अपनी आर्थिक असमर्थता का हवाला देते हुए सज़ा को घटाकर उतनी करने की गुहार लगाई जितनी वह पहले ही काट चुका है।
शिकायतकर्ता के वकील ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यदि सज़ा कम की जाती है तो मुआवज़े की रकम ₹50,000 बढ़ा दी जानी चाहिए। हालांकि, याचिकाकर्ता ने ₹40,000 की बढ़ोतरी स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की। कोर्ट ने पाया कि कस्टडी सर्टिफ़िकेट के अनुसार, याचिकाकर्ता पहले ही 3 महीने और 11 दिन की जेल काट चुका था। कोर्ट ने यह भी देखा कि जो रकम नहीं चुकाई गई थी और जितनी अवधि याचिकाकर्ता ने कस्टडी में बिताई थी, उनके बीच क्या अनुपात था।
याचिका को आंशिक रूप से मंज़ूर करते हुए कोर्ट ने NI Act की धारा 138 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा, मूल सज़ा को घटाकर उतनी अवधि तक सीमित किया, जितनी याचिकाकर्ता पहले ही काट चुका था, और मुआवज़े की रकम ₹5.70 लाख से बढ़ाकर ₹6.10 लाख की।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुआवज़े की रकम, साथ ही उस पर जमा हुआ ब्याज़ (यदि कोई हो), शिकायतकर्ता को दे दिया जाए।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने का भी आदेश दिया, बशर्ते कि किसी अन्य मामले में उसकी ज़रूरत न हो।
Title: Gulab Singh v. State of Haryana and another

