पटना हाईकोर्ट ने "अस्पष्ट" व्यभिचार के आरोपों पर तलाक़ देने से इनकार किया, कहा - दलीलों से परे के सबूतों पर विचार नहीं किया जा सकता
Shahadat
9 May 2026 6:06 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने व्यभिचार के आरोपों पर आधारित पति की तलाक़ की अर्ज़ी खारिज करने का फ़ैसला सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि समय, जगह या पहचान के ब्योरे के बिना लगाए गए अस्पष्ट और बिना सबूतों वाले आरोप तलाक़ के आदेश का आधार नहीं बन सकते। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि राहत देने के लिए दलीलों से परे के सबूतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
जस्टिस नानी टागिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडे की डिवीज़न बेंच सिवान के प्रिंसिपल जज, फ़ैमिली कोर्ट के 2019 के फ़ैसले को चुनौती देने वाली विविध अपील पर सुनवाई कर रही थी। उस फ़ैसले में पति की तलाक़ की अर्ज़ी खारिज की गई, जबकि पत्नी के ख़िलाफ़ कार्यवाही एकतरफ़ा (ex parte) ढंग से चलाई गई।
अपील करने वाले पति ने दलील दी कि शादी के दो साल बाद पत्नी का बर्ताव बदल गया और वह परिवार वालों को बिना बताए अक्सर बाज़ार जाने लगी। उसने आरोप लगाया कि 15 अक्टूबर 2012 को वह सुबह 11 बजे घर से निकली और रात 9 बजे लौटी, जिसके बाद उसने कथित तौर पर उसे एक सिनेमा हॉल से किसी दूसरे आदमी के साथ बाहर निकलते हुए देखा। उसके मुताबिक, उसे बाद में पता चला कि पत्नी का शादी से पहले भी धनंजय तिवारी नाम के एक व्यक्ति के साथ प्रेम-संबंध था।
यह तर्क दिया गया कि फ़ैमिली कोर्ट दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को ठीक से समझने में नाकाम रहा। इन सबूतों में यह दावा भी शामिल था कि पत्नी को अलग-अलग पुरुषों के साथ देखा गया और उसने पति की मर्ज़ी के बिना वैवाहिक घर छोड़ दिया। अपील करने वाले ने यह भी दलील दी कि नोटिस दिए जाने के बावजूद पत्नी कोर्ट में पेश नहीं हुई। इसलिए फ़ैमिली कोर्ट को एकतरफ़ा तलाक़ का आदेश दे देना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि हालांकि पत्नी को कोर्ट में पेश करने के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठाए गए, फिर भी तलाक़ की अर्ज़ी में लगाए गए आरोप अपने आप में ही बुनियादी तौर पर कमज़ोर थे। बेंच ने टिप्पणी की कि अर्ज़ी में उस व्यक्ति का कोई ख़ास समय, जगह या पहचान नहीं बताई गई, जिसके साथ पत्नी का कथित तौर पर अवैध संबंध था। यहां तक कि कथित प्रेमी को भी इस कार्यवाही में एक पक्ष के तौर पर शामिल नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह टिप्पणी की:
“प्रतिवादी/पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया, लेकिन उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया गया, जो प्रतिवादी के साथ था; जिस व्यक्ति पर आरोप लगाया गया, उसे मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया। यह आरोप अस्पष्ट है...”
बेंच ने आगे यह भी कहा कि 15.10.2012 की घटना के अलावा, 2003 और 2012 के बीच किसी भी कथित दुराचार के संबंध में कोई विवरण नहीं दिया गया। कोर्ट ने माना कि पति ने केवल मोटे तौर पर यह दावा किया कि शादी के दो साल बाद पत्नी “अनुशासनहीन” हो गई, लेकिन उसने कोई विशिष्ट उदाहरण या परिस्थितियाँ नहीं बताईं।
कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष से भी सहमति जताई कि, हालांकि गवाहों ने धनंजय तिवारी के साथ कथित संबंध का ज़िक्र किया, लेकिन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित गाँव के किसी भी गवाह की जाँच नहीं की गई।
महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि किसी मामले का निर्णय करते समय, लिखित दलीलों (Pleadings) से बाहर के सबूतों पर विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि पक्षों को बिना किसी आधारभूत लिखित दलील के, केवल सबूतों के माध्यम से नए तथ्य पेश करने की अनुमति दी जाती है तो इससे लिखित दलीलों का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा और विरोधी पक्ष को अचानक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा, जिसके लिए वे तैयार नहीं थे।
यह मानते हुए कि फैमिली कोर्ट ने सभी प्रासंगिक सामग्रियों पर विधिवत विचार किया और तलाक़ की याचिका को खारिज करने के लिए उचित कारण दर्ज किए, हाईकोर्ट ने अपील खारिज की।
Case Title: Shyam Bihari Mishra v. Sanju Devi.

