'कल्पना से परे: FSL रिपोर्ट के बिना ज़ब्त चीज़ों को 'नशीला पदार्थ' कैसे मान लिया गया': पटना हाईकोर्ट ने 27 साल बाद NDPS के आरोपी को बरी किया

Shahadat

27 March 2026 9:00 PM IST

  • कल्पना से परे: FSL रिपोर्ट के बिना ज़ब्त चीज़ों को नशीला पदार्थ कैसे मान लिया गया: पटना हाईकोर्ट ने 27 साल बाद NDPS के आरोपी को बरी किया

    पटना हाईकोर्ट ने NDPS Act के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी किया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष कानून के मुताबिक नशीला पदार्थ बरामद होने की बात साबित करने में नाकाम रहा और अनिवार्य सुरक्षा उपायों का पालन न करने के साथ-साथ सबूतों में कमियों ने दोषसिद्धि रद्द की।

    जस्टिस आलोक कुमार पांडे की सिंगल बेंच, एडिशनल जिला एवं सेशन जज (तृतीय), आरा, भोजपुर द्वारा 27.12.2010 को NDPS केस नंबर 2/1998 में दिए गए फैसले के खिलाफ आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला शाहपुर थाना केस नंबर 7/1998 से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को NDPS Act की धारा 20(b) के तहत दोषी ठहराया और उसे 10 साल की कठोर कारावास की सज़ा के साथ ₹20,000 का जुर्माना भी लगाया।

    अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 20.01.1998 को पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर शाहपुर बाज़ार में एक फूस की झोपड़ी पर छापा मारा, जहां कथित तौर पर अपीलकर्ता के पास से गांजा बरामद हुआ। आरोप था कि मौके से लगभग 500 ग्राम गांजा, छोटे-छोटे पैकेट और एक तराजू बरामद किया गया और अपीलकर्ता को भागने की कोशिश करते समय पकड़ लिया गया।

    अपीलकर्ता ने दलील दी कि कथित बरामदगी केवल लगभग 530 ग्राम थी, जो उस समय "छोटी मात्रा" (Small Quantity) की श्रेणी में आती थी, जिसके लिए अधिकतम सज़ा छह महीने या जुर्माना हो सकता था। यह तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने दस साल की सज़ा सुनाने में गलती की। अपीलकर्ता ने आगे कहा कि NDPS Act की धारा 50 के तहत अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया गया, क्योंकि उसे यह नहीं बताया गया कि उसे किसी राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) या मजिस्ट्रेट के सामने अपनी तलाशी करवाने का अधिकार है। यह भी बताया गया कि ज़ब्ती के स्वतंत्र गवाह अपने बयान से पलट गए, घटना स्थल ठीक से साबित नहीं हो पाया और यह साबित करने के लिए कोई रासायनिक जांच रिपोर्ट पेश नहीं की गई कि ज़ब्त किया गया पदार्थ गांजा ही था।

    राज्य ने यह तर्क दिया कि शिकायतकर्ता (P.W.2) और एक अन्य पुलिस गवाह (P.W.4) की गवाही से बरामदगी और ज़ब्ती पर्याप्त रूप से साबित हो गई। यह प्रस्तुत किया गया कि स्वतंत्र गवाहों का पक्ष बदलना (होस्टाइल होना) ज़रूरी नहीं कि अभियोजन पक्ष के मामले को कमज़ोर कर दे। हालांकि, राज्य ने निष्पक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि इसमें शामिल मात्रा व्यावसायिक मात्रा से कम थी और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा लागू वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।

    यह जांचते हुए कि क्या धारा 20(b) के तहत अपराध साबित हुआ, कोर्ट ने साक्ष्य रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की और उसमें महत्वपूर्ण कमियाँ पाईं। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता घटना स्थल को स्पष्ट रूप से स्थापित करने में विफल रहा और उसने यह स्वीकार किया कि ज़ब्त की गई वस्तुएं ट्रायल के दौरान कोर्ट के समक्ष पेश नहीं की गई थीं। कोर्ट ने इस तथ्य का भी संज्ञान लिया कि स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं किया और उन्होंने कहा था कि उनके हस्ताक्षर कोरे कागज़ों पर लिए गए थे, जिससे उनकी गवाही अविश्वसनीय हो गई।

    ज़ब्ती के संबंध में कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला ज़ब्ती सूची पर ही आधारित था। हालांकि, ज़ब्त की गई सामग्री को रासायनिक जांच के लिए नहीं भेजा गया, और न ही कोई फोरेंसिक रिपोर्ट रिकॉर्ड पर लाई गई, जिससे यह साबित हो सके कि बरामद किया गया पदार्थ गांजा था। कोर्ट ने यह माना कि यह बात अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ पर ही प्रहार करती है और कथित बरामदगी को असिद्ध कर देती है।

    कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

    “रिकॉर्ड की जांच करने पर यह बिल्कुल साफ़ है कि ज़ब्त की गई चीज़/गांजा को केमिकल जांच के लिए नहीं भेजा गया। सवाल यह उठता है कि बिना किसी FSL रिपोर्ट के ज़ब्त की गई चीज़ को गांजा कैसे मान लिया गया। एक बहुत ही अहम सवाल यह उठता है कि जांच अधिकारी ने गांजा के बारे में FSL रिपोर्ट के बिना NDPS Act की धारा-20(B) के तहत चार्जशीट कैसे दाखिल की और इस मामले को आगे कैसे बढ़ाया गया। यह कल्पना से परे है कि बिना किसी जांच के बरामद की गई चीज़ों को नशीला पदार्थ घोषित कर दिया गया। अपीलकर्ता के वकील की यह दलील काफी ठोस है कि बरामद चीज़ों के बारे में FSL रिपोर्ट न होने के कारण NDPS मामले को साबित करने का मूल आधार ही संदिग्ध है। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष कई मामलों में अपना केस साबित करने में नाकाम रहा है, जिसमें NDPS Act की धारा 50 के अनिवार्य प्रावधान का पालन न करना भी शामिल है। इस धारा के तहत,तलाशी लेने वाले अधिकारी का यह कानूनी दायित्व था कि वह आरोपी को उसके इस अधिकार के बारे में सूचित करे कि उसकी तलाशी किसी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में ली जाए। इस प्रावधान का पालन न होने की स्थिति में कथित तलाशी और ज़ब्ती की प्रक्रिया ही अमान्य हो जाती है।”

    'सचेत कब्ज़े' (Conscious Possession) के पहलू पर कोर्ट ने यह माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि कथित बरामदगी अपीलकर्ता के 'विशेष कब्ज़े' (Exclusive Possession) से की गई। कोर्ट ने यह भी पाया कि ऐसा कोई भी विश्वसनीय सबूत मौजूद नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि जिस झोपड़ी से कथित तौर पर प्रतिबंधित सामग्री बरामद की गई थी, वह अपीलकर्ता की थी, या उस जगह पर उसका ही एकमात्र नियंत्रण था। कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी की कि घटना स्थल को भी ठीक से साबित नहीं किया गया।

    इन कमियों को देखते हुए कोर्ट ने यह फैसला दिया कि अभियोजन पक्ष अपने केस को 'उचित संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में नाकाम रहा है। तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और दोषसिद्धि तथा सज़ा रद्द की गई।

    Case Title: Tilakhdhari Yadav v. State of Bihar.

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