Honeymoon Murder Case | मेघालय हाईकोर्ट ने सोनम रघुवंशी की ज़मानत बरकरार रखी

Shahadat

29 Jun 2026 8:15 PM IST

  • Honeymoon Murder Case | मेघालय हाईकोर्ट ने सोनम रघुवंशी की ज़मानत बरकरार रखी

    मेघालय हाईकोर्ट ने शिलांग कोर्ट का अप्रैल 2026 का आदेश बरकरार रखा, जिसमें सोनम रघुवंशी को ज़मानत दी गई थी। सोनम मई 2025 में अपने पति राजा रघुवंशी की चौंकाने वाली "हनीमून मर्डर" (हनीमून के दौरान हत्या) की मुख्य संदिग्ध हैं।

    इसके साथ ही जस्टिस डब्ल्यू डिएंगडोह की बेंच ने रघुवंशी को मिली ज़मानत को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की अपील खारिज की। कोर्ट ने दोनों पक्षों की 10 दिनों से ज़्यादा समय तक दलीलें सुनने के बाद 10 जून को इस मामले में अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था।

    गौरतलब है कि शिलांग के एडिशनल डीसी (ज्यूडिशियल) ने रघुवंशी को यह राहत मुख्य रूप से इस आधार पर दी थी कि पुलिस उन्हें उनकी गिरफ़्तारी के कारण प्रभावी ढंग से नहीं बता पाई थी, जिससे उनके बचाव पर बुरा असर पड़ा।

    वास्तव में कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता से जुड़े सभी दस्तावेज़ों में - जिसमें गिरफ़्तारी के औचित्य की चेकलिस्ट और केस डायरी का अंश शामिल है - पुलिस ने गलती से BNS की धारा 103(1) (हत्या की सज़ा) के बजाय BNS की धारा 403(1) का ज़िक्र किया।

    शिलांग कोर्ट ने गौर किया कि किसी भी दस्तावेज़ में याचिकाकर्ता को यह नहीं बताया गया कि उन्हें असल में BNS की धारा 103(1) के तहत बहुत गंभीर अपराध के लिए गिरफ़्तार किया जा रहा है। कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि यह कोई लिपिकीय त्रुटि (clerical error) थी।

    कोर्ट ने कहा था,

    "...ऐसी गलती सभी डॉक्यूमेंट्स में नहीं हो सकती। वास्तव में, सोनम रघुवंशी से जुड़े सभी डॉक्यूमेंट्स - जैसे गिरफ्तारी के कारण बताने वाली चेकलिस्ट, गिरफ्तारी का मेमो, इंस्पेक्शन मेमो, गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों की जानकारी, केस डायरी का हिस्सा - में सोहरा PS केस नंबर 7/2025 u/s 403(1)/238(a)/309(6)/3(6) BNS का ज़िक्र है। किसी भी डॉक्यूमेंट में याचिकाकर्ता को यह नहीं बताया गया कि उसे BNS की धारा 103(1) के तहत अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के आधार बताने वाले फॉर्मेट में भी यह देखा गया कि अपराध से जुड़े खास तथ्यों की जानकारी आरोपी व्यक्ति को नहीं दी गई।"

    शिलांग कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार हाई कोर्ट पहुंची थी।

    राज्य की ओर से पेश होते हुए एडवोकेट जनरल, सीनियर एडवोकेट अमित कुमार ने कहा कि रघुवंशी की चौथी ज़मानत अर्ज़ी में एक भी लाइन ऐसी नहीं थी जिससे यह पता चले कि प्रक्रियात्मक गलती से उन्हें कोई वास्तविक नुकसान हुआ हो।

    उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह बात मानी गई कि गिरफ्तारी के डॉक्यूमेंट्स में टाइपिंग की गलती (BNS की धारा 103 के बजाय 403 का ज़िक्र) हुईं।

    हालांकि, AG कुमार ने कहा कि रघुवंशी को अपने ऊपर लगे गंभीर आरोपों (हत्या सहित) की पूरी जानकारी थी, जैसा कि गिरफ्तारी मेमो और रिमांड आदेशों पर उनके हस्ताक्षर से साबित होता है।

    AG कुमार ने 'स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम श्री दर्शन आदि 2025 LiveLaw (SC) 801' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि अगर कोई नुकसान (जैसे अनियमितता) साबित न हो, तो यह ज़्यादा से ज़्यादा एक सुधारी जा सकने वाली कमी है और अकेले इसके आधार पर ज़मानत नहीं दी जा सकती।

    5 मई को सुनवाई के दौरान, जस्टिस डब्ल्यू. डिएंगडोह ने AG से मौखिक रूप से पूछा कि डॉक्यूमेंट्स में वही टाइपिंग की गलती बार-बार क्यों हुई; इस बात पर शिलांग कोर्ट ने भी ध्यान दिया। इसके जवाब में AG कुमार ने कहा कि रिमांड ऑर्डर में मजिस्ट्रेट ने पुष्टि की कि आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में ज़ुबानी तौर पर बता दिया गया था।

    जस्टिस डिंगडोह ने ज़ुबानी तौर पर यह भी कहा कि गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेज़ एक जैसे फ़ॉर्मेट (टेम्पलेट) पर आधारित थे, जिससे पहली नज़र में ऐसा लगता है कि आरोपी को शायद ठीक से जानकारी नहीं दी गई।

    सिंगल जज ने यह भी गौर किया कि फ़ॉर्म के एक हिस्से में आरोपी को सशस्त्र बलों से 'भगोड़ा' (डेज़र्टर) बताया गया था, जिसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था।

    टाइपिंग की गलतियों को मानते हुए AG कुमार ने ज़ोर देकर कहा कि आरोपी को अपने ऊपर लगे आरोपों की पूरी जानकारी थी, क्योंकि शुरू से ही उनके वकील उनके साथ थे, उन्होंने गिरफ्तारी से जुड़े मेमो पर हस्ताक्षर किए थे और ज़मानत की पिछली 3 अर्जियां दाखिल करने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।

    AG कुमार ने कहा,

    "किसी भी समय प्रतिवादी (आरोपी) के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ... अपनी चौथी ज़मानत अर्ज़ी में उन्होंने कहा कि उन्हें गिरफ्तारी के आधार के बारे में नहीं बताया गया... जबकि आपके ट्रांज़िट ऑर्डर, ट्रांज़िट रिमांड, चार्जशीट और चार्जशीट तय होने के समय - हर बार आपको यह जानकारी थी कि आपको हत्या के अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया।"

    आखिर में, उन्होंने दलील दी कि आरोपी के भागने की संभावना बहुत ज़्यादा है। इसके जवाब में जस्टिस डिंगडोह ने कहा कि ज़मानत की शर्तें बहुत साफ़ हैं और अगर वह भागती है, तो कानून अपना काम करेगा।

    सोनम की तरफ़ से वकील एल थापा पेश हुए, जिनकी मदद वकील सुदीप राणा ने की।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला तब सामने आया, जब 12 मई, 2025 को शादी करने वाला यह जोड़ा 23 मई को मेघालय में हनीमून के दौरान लापता हो गया। उन्हें आखिरी बार नोंग्रियाट में एक होमस्टे से चेक-आउट करते हुए देखा गया।

    कुछ दिनों बाद उनका किराए का स्कूटर सोहरालिम के पास लावारिस हालत में मिला। फिर 2 जून को उनके लापता होने के लगभग 10 दिन बाद पूर्वी खासी हिल्स में वेइसॉवडोंग फॉल्स के पास एक गहरी खाई में राजा का शव मिला।

    उनकी पत्नी और आरोपी रघुवंशी, जो 8 जून तक लापता थी, वाराणसी-गाज़ीपुर मुख्य सड़क पर एक ढाबे के पास मिली। बाद में मेघालय पुलिस ने बताया कि सोनम को 21 साल के राज कुशवाहा के साथ अपने पति की हत्या के मुख्य संदिग्धों में से एक माना जा रहा है।

    राज्य पुलिस ने इस मामले में 700 से ज़्यादा पन्नों की चार्जशीट दाखिल की, जिसमें दावा किया गया कि हत्या सोनम और उसके कथित प्रेमी कुशवाहा ने पहले से योजना बनाकर की थी।

    Next Story