महिलाओं के करियर पर फोकस करने से टूटती शादियां रोकने के लिए मद्रास हाईकोर्ट का सुझाव- पति 'गृहिणी' की भूमिका निभाएं
Shahadat
24 Sept 2026 3:18 PM IST

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में पाया कि महिलाओं के तेजी से करियर-उन्मुख होने के कारण, कुछ करियर महिलाओं, विशेष रूप से आईटी क्षेत्र और अन्य व्यवसायों में काम करने वाली महिलाओं के लिए शादी "जीत का प्रस्ताव" साबित नहीं हो रही है।
कोर्ट ने कहा कि कुछ महिलाएं शादी को अपने करियर की संभावनाओं में बाधा के रूप में देख सकती हैं और शादी न करने का विकल्प चुन सकती हैं।
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की खंडपीठ ने कहा कि परंपरागत रूप से पति से वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जाती थी और पत्नी घरेलू क्षेत्र की देखभाल करती थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में भूमिकाएं बदल रही हैं, महिलाएं तेजी से करियर बना रही हैं।
कोर्ट ने कहा कि यह बदलाव "कई रिश्तों पर असर डाल रहा है" और सुझाव दिया कि "अगर घरेलू पत्नियां हो सकती हैं, तो घरेलू पति भी हो सकते हैं", और कहा, "इसे एक नया सामान्य बनने दें।"
अदालत ने कहा,
"परंपरागत रूप से वित्तीय संसाधन जुटाने की ज़िम्मेदारी पति पर होती है, पत्नी घरेलू मोर्चे की देखभाल करती है। दोनों भूमिकाएं समान सम्मान की हकदार हैं। यह स्थिति पिछली आधी सदी में बदल रही है। महिलाएं भी तेजी से कैरियर उन्मुख हो रही हैं। हम देखते हैं कि यह कई रिश्तों पर असर डाल रहा है। विशेष रूप से, आईटी क्षेत्र और व्यवसायों में। करियर महिलाओं के लिए विवाह एक जीत-जीत प्रस्ताव साबित नहीं हो रहा है। चूंकि ऐसी महिलाएं शादी को अपने कैरियर की संभावनाओं के लिए एक बाधा के रूप में देखती हैं, इसलिए वे इसे चुनती हैं। इसे पूरी तरह छोड़ दें तो अविवाहित महिलाओं की संख्या बढ़ रही है।''
अदालत ने कहा कि स्थिति का संभावित समाधान यह हो सकता है कि पति गृहिणी बनने का विकल्प चुनें। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जब महिलाएं गृहिणी हो सकती हैं, तो पुरुष भी गृह पति हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि गृह निर्माता की अभिव्यक्ति लिंग तटस्थ है और यदि पुरुष गृह पति बनना चुनते हैं, तो यह विवाह की संस्था को संरक्षित कर सकता है।
अदालत ने कहा,
"अगर पति होम मेकर बनने का विकल्प चुनते हैं तो शायद स्थिति का समाधान किया जा सकता है... अगर हाउस वाइफ हो सकती हैं तो हाउस हसबैंड भी हो सकते हैं। इसे एक नया सामान्य बनने दें। हमारा विचार है कि इससे विवाह और परिवार की संस्था को संरक्षित करने में मदद मिलेगी। होम मेकर की अभिव्यक्ति सामान्य तटस्थ है। ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी होम मेकर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो घर पर काम करती है और घर और परिवार की देखभाल करती है। माननीय सुप्रीम कोर्ट इस तथ्य को रेखांकित कर रहा है कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले कार्य एक गृहिणी के रूप में होते हैं। गृह निर्माता का अत्यधिक आर्थिक मूल्य है।''
अदालत ने दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं - एक पति द्वारा और दूसरी पत्नी द्वारा, फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ, जिसमें क्रमशः तलाक की याचिका और पार्टियों द्वारा दायर वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका खारिज की गई।
दोनों पक्षकारों के बीच शादी 2011 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई। उस समय दोनों पक्ष कार्यरत थे। 2012 में पार्टियों के यहां एक बेटे का जन्म हुआ। जब पति, जिसके पास पहले से ही एमडी की डिग्री थी, आगे की पढ़ाई करना चाहता था, तो पत्नी ने अपने माता-पिता के साथ रहने का फैसला किया। डीएम कार्डियोलॉजी की पढ़ाई के दौरान पति ससुराल में पत्नी और बच्चे से मासिक तौर पर मिलने आता था।
2016 में दंपति के एक और बेटे का जन्म हुआ। 2017 में डीएम कार्डियोलॉजी खत्म करने के बाद पति एफएनबी (इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी) योग्यता हासिल करना चाहता था, और पत्नी अपने मायके में ही रही। पति मासिक मुलाकात करता रहा। कोरोना हुआ तो पति पत्नी के पास मायके आ गया। अदालत ने कहा कि उस समय पति को ससुराल में रहने में कोई परेशानी नहीं हुई।
बाद में जब पति के करियर की संभावनाएं बनीं तो वह ससुराल से बाहर जाना चाहता था, जिसे पत्नी ने स्वीकार नहीं किया। इससे दंपत्ति के बीच मनमुटाव हो गया और हाथापाई तक की नौबत आ गई।
बाद में पत्नी ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की, जबकि पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए याचिका दायर की। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कीं और पार्टियों ने अपील के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत ने कहा कि पति योग्य होने तक ससुराल में रहने में सहज था, और एक बार जब वह एक सफल पेशेवर बन गया तो उसके लिए वही व्यवस्था संभव नहीं थी। अदालत ने कहा कि सफल होने के बाद पति का पुरुष अहंकार अपनी पूरी महिमा में सामने आया।
अदालत ने टिप्पणी की कि जहां पति अपने कौशल को निखारने पर ध्यान केंद्रित कर रहा था, वहीं पत्नी की क्षमताएं कुंद हो गईं। अदालत ने इस प्रकार टिप्पणी की कि यह उचित होता अगर पति परिवार की देखभाल और दो बच्चों की मां बनने में पत्नी द्वारा निभाई गई भूमिका को स्वीकार करता।
पक्षकारों से बातचीत के बाद अदालत संतुष्ट हो गई कि वैवाहिक संबंध ख़त्म हो चुका है और मरम्मत के लायक नहीं रह गया। हालांकि, यह देखते हुए कि जब पति ने उसे छोड़ दिया तो पत्नी कहीं नहीं बचेगी, अदालत ने पति से उचित प्रस्ताव देने को कहा। इसके बाद पति 2.5 करोड़ रुपये देने पर राजी हो गया, जिसे पत्नी ने स्वीकार किया।
इस प्रकार अदालत ने पति को पत्नी के नाम पर 1.5 करोड़ रुपये और प्रत्येक नाबालिग बच्चे के नाम पर 50,00,000 रुपये जमा करने का निर्देश दिया और दोनों पक्षों के बीच विवाह समाप्त किया।
Case Title: V v A

