'ऑनर किलिंग' में कोई 'सम्मान' नहीं होता, यह कृत्य शर्मनाक और जातिवाद का चरम रूप: मद्रास हाईकोर्ट
Shahadat
13 Jun 2026 12:51 PM IST

पिछले साल तिरुनेलवेली में 27 साल के कविन की ऑनर किलिंग के मामले में आरोपी पुलिसकर्मी की ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने जाति-आधारित हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई।
जस्टिस बी पुगलेंधी ने कहा कि पिछले 10 सालों में तमिलनाडु राज्य में 59 ऑनर किलिंग की घटनाएं हुई हैं। जज ने कहा कि लोगों के मन में गहराई तक बैठी जातिवाद की भावना पूरे सिस्टम को खराब कर रही है।
कोर्ट ने कहा,
"ऑनर किलिंग जातिवाद का चरम रूप है। जातिवाद समाज को बांटता है और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने लाला सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [2006 (5) SCC 475] मामले में कहा कि जातिवाद देश के लिए एक अभिशाप है। असल में, यह ऑनर किलिंग का पहला मामला नहीं है और राज्य में पिछले 10 सालों में 59 ऑनर किलिंग की घटनाएं सामने आई हैं। जातिवाद लोगों के मन में गहराई तक बैठ गया है और यह पूरे सिस्टम को खराब कर रहा है।"
जज ने कहा,
"सूरज सभी को रोशनी देता है, बारिश सभी पर होती है और हवा सभी के लिए एक जैसी है। प्रकृति जाति को नहीं पहचानती। जब समाज जाति की बनावटी बाधाओं से ऊपर उठेगा, तभी वह इस शाश्वत सत्य को समझ पाएगा कि सभी इंसान बराबर हैं और ऑनर किलिंग में कोई 'सम्मान' नहीं होता, बल्कि यह एक शर्मनाक काम है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) जैसे कानूनों से उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले हैं, क्योंकि इस कानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ रही है। कोर्ट ने कहा कि युवा पीढ़ी की सोच में बदलाव लाने के लिए स्कूल स्तर पर सुधार किए जाने चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"SC/ST Act जैसे कानूनों से उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले हैं। इस कानून के तहत दर्ज होने वाली घटनाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं और युवा पीढ़ी की सोच बदलने के लिए स्कूल स्तर पर सुधार किए जाने चाहिए।"
कोर्ट ने कहा कि देश की सेवा करने वाले सैनिक, बिना किसी जाति-भेद के मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपनी जान तक दे देते हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि जब कोई सैनिक दुश्मन की गोली का सामना करता है तो न तो उसके खून पर और न ही उसकी देशभक्ति पर जाति की कोई छाप होती है। कोर्ट ने कहा कि यह उदाहरण देश को एक ऐसा समाज बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जहां जाति-भेद न हो और हर व्यक्ति के साथ सम्मान से पेश आया जाए।
कोर्ट ने कहा,
"जब वे दुश्मन की गोली का सामना करते हैं और मातृभूमि की रक्षा में अपनी जान देते हैं तो न तो उनके खून पर और न ही उनकी देशभक्ति पर जाति की कोई छाप होती है। उनका जीवन और बलिदान एकता और समानता के उन आदर्शों को दर्शाता है जो हमारे संविधान की नींव हैं। अगर देश की रक्षा करने वाले लोग एक मकसद के लिए एकजुट हो सकते हैं तो उनका उदाहरण हर नागरिक को जाति-भेद को छोड़ने और एक ऐसा समाज बनाने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जहां हर व्यक्ति के साथ सम्मान से पेश आया जाए।"
कोर्ट ने ये बातें तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में एक टेक कर्मचारी (टेकी) कविन की 'ऑनर किलिंग' (सम्मान के नाम पर हत्या) के मामले में आरोपी सरवनन की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कहीं।
चेन्नई में काम करने वाले और हिंदू देवेंद्र कुला वेल्लार समुदाय से ताल्लुक रखने वाले टेकी कविन सेल्वगणेश की 27 जुलाई, 2025 को हत्या कर दी गई थी। हत्या करने वाले उस महिला के परिवार वाले थे, जिसके साथ कथित तौर पर उसका प्रेम संबंध था; वह महिला हिंदू मारवर समुदाय से थी। मुख्य आरोपी महिला का भाई था और सरवनन महिला का पिता था। घटना के समय सरवनन और उसकी पत्नी दोनों पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे।
हाईकोर्ट ने पहले सरवनन की ज़मानत याचिका खारिज की थी। बाद में उसने ट्रायल कोर्ट में ज़मानत याचिकाएं दायर कीं, जिन्हें फिर से खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ यह आपराधिक अपील दायर की गई।
कोर्ट ने गौर किया कि मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई और आगे की कार्यवाही पर रोक लगाई गई। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि सरवनन 10 महीने से जेल में है और उसे और अधिक समय तक जेल में रखना 'प्री-ट्रायल' (मुकदमा शुरू होने से पहले की) कैद के बराबर होगा।
इसलिए कोर्ट ने उसे कुछ शर्तों के साथ ज़मानत दे दी। सरवनन को कोयंबटूर में रहने और दिन में दो बार पुलिस के सामने हाज़िर होने के लिए कहा गया। उन्हें 1,00,000 रुपये का बॉन्ड और उतनी ही राशि के दो ज़मानतदार भरने पर ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया। उनसे पुलिस के सामने एक हलफ़नामा भी देने को कहा गया, जिसमें यह कहा जाए कि वे अपनी आज़ादी का गलत इस्तेमाल नहीं करेंगे, कोई और अपराध नहीं करेंगे और ट्रायल के दौरान घटना वाली जगह पर नहीं जाएंगे।
Case Title: Saravanan v The State of Tamil Nadu

