शादी का मकसद सिर्फ़ बच्चे पैदा करना नहीं, बच्चा न होना क्रूरता नहीं: मद्रास हाईकोर्ट
Shahadat
3 Oct 2026 1:46 PM IST

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पति को कथित क्रूरता के आधार पर तलाक देने से इनकार कfया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि कपल को बच्चा नहीं हुआ, पत्नी वैवाहिक रिश्ते में नाकाम नहीं रही। [2026 LiveLaw (Mad) 477]
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की बेंच ने कहा कि कपल का बच्चा न हो पाना पत्नी की वैवाहिक गलती नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि शादी का मकसद सिर्फ़ बच्चे पैदा करना नहीं हो सकता।
कोर्ट ने कहा,
"सबसे अहम बात यह है कि कपल का बच्चा न हो पाना, अपने आप में पत्नी की वैवाहिक गलती नहीं मानी जा सकती। शादी का मकसद सिर्फ़ बच्चे पैदा करना नहीं हो सकता। सिर्फ़ इसलिए कि कपल को बच्चा नहीं हुआ, किसी जीवनसाथी को वैवाहिक रिश्ते में नाकाम नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट ने देखा कि इस मामले में पत्नी को फाइब्रॉएड की समस्या थी और उसने इलाज करवाया। मेडिकल प्रक्रिया में होने वाली शारीरिक तकलीफ़ का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि इलाज की चुनौतियों के बारे में जानने के बावजूद पत्नी का इलाज कराने के लिए तैयार होना ही शादी को बचाने की उसकी इच्छा को दिखाता है।
कोर्ट ने कहा,
"असल में यह बात कि पत्नी बार-बार और मुश्किल फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से गुज़री, यह दिखाती है कि उसने वैवाहिक रिश्ता नहीं छोड़ा। इलाज में शारीरिक तकलीफ़, बार-बार मेडिकल प्रक्रियाएं, भावनात्मक अनिश्चितता और काफ़ी ज़्यादा निजी तनाव शामिल है। ऐसे इलाज से गुज़रने की उसकी इच्छा को क्रूरता वाला व्यवहार नहीं माना जा सकता। बल्कि, इस मामले के हालात में यह शादी को बचाने की उसकी इच्छा को दिखाने वाली बात है।"
कोर्ट पति की उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने कथित क्रूरता के आधार पर तलाक देने से इनकार करने वाले फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
कपल की शादी 2007 में हुई। पति के अनुसार, वैवाहिक जीवन के शुरुआती छह महीने शांतिपूर्ण थे, लेकिन उसके बाद पत्नी का व्यवहार और नज़रिया बदल गया। उसने तर्क दिया कि पत्नी उसे मानसिक रूप से परेशान करने लगी थी; वह अपने परिवार को उसके परिवार से बेहतर समझती थी और उसके तथा उसके परिवार के बारे में अपमानजनक बातें कहती थी।
पति ने तर्क दिया कि जब भी वह ऑफिस से देर से आता था, तो पत्नी उस पर बेवजह शक करती थी और जान-बूझकर बाहर रहने का आरोप लगाती थी। यह भी बताया गया कि दंपति की कोई संतान नहीं है और इलाज कराने के बाद भी पत्नी गर्भवती नहीं हो पाई। पति ने यह भी आरोप लगाया कि एक बार पत्नी ने सबके सामने उसे गाली दी, उसे नामर्द कहा, चप्पल से मारा, अपना मंगलसूत्र (थाली) उतारकर उस पर फेंका और फिर अपने मायके चली गई। पति के अनुसार, पत्नी ने ससुराल लौटने से इनकार कर दिया।
पत्नी ने आरोपों से इनकार किया। उसने कहा कि पति को शराब पीने की आदत है और उसने केवल नशे की हालत में गाड़ी चलाकर घर आने पर आपत्ति जताई। उसने पति को बताए बिना ससुराल छोड़ने की बात से भी इनकार किया और कहा कि जब भी पति काम के सिलसिले में शहर से बाहर जाता था तो वह खुद ही उसे उसकी बहन के घर छोड़ देता था। पत्नी ने पति को गाली देने और शारीरिक रूप से मारपीट करने के आरोपों से भी इनकार किया।
बच्चों के संबंध में पत्नी ने स्वीकार किया कि उसकी सर्जरी हुई और उसका इलाज चल रहा है। उसने कहा कि बच्चे का न होना पति के साथ वैवाहिक जीवन जीने से उसकी जान-बूझकर इनकार करने के कारण नहीं है।
फैमिली कोर्ट ने सबूतों पर विचार करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पति द्वारा लगाए गए आरोपों का समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं है। अदालत ने यह भी गौर किया कि पत्नी का इलाज चल रहा है और ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी हमेशा के लिए बच्चा पैदा करने में असमर्थ है।
अपील में, पति ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने स्वतंत्र पुष्टि (Independent Corroboration) न होने पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया। यह तर्क दिया गया कि वैवाहिक क्रूरता आमतौर पर वैवाहिक घर की चारदीवारी के भीतर होती है। ऐसी क्रूरता को स्वतंत्र चश्मदीद गवाहों या पुलिस शिकायतों के ज़रिए साबित नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट इस बात से सहमत था कि क्रूरता का आकलन वैवाहिक रिश्ते को समग्र रूप से देखकर किया जाना चाहिए, न कि किसी कठोर और यांत्रिक फ़ॉर्मूले को लागू करके, लेकिन बिना साबित हुए आरोप अपने आप में क्रूरता साबित नहीं हो जाते। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि व्यवहार का कुल असर महत्वपूर्ण है, लेकिन उस व्यवहार को बनाने वाले बुनियादी तथ्यों को साबित करना होगा। मौजूदा मामले में, कोर्ट ने पाया कि पति क्रूरता के आरोपों को साबित नहीं कर पाया।
कोर्ट ने पत्नी के व्यवहार पर भी ज़ोर दिया, जिसने यह जानते हुए भी मेडिकल प्रक्रिया करवाई कि इसका उस पर मानसिक और शारीरिक असर क्या होगा। कोर्ट ने माना कि जो व्यक्ति वैवाहिक जीवन को छोड़ने का इरादा रखता है, वह आम तौर पर वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू करने की इच्छा ज़ाहिर नहीं करेगा।
इस प्रकार, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई कमी न पाते हुए कोर्ट ने अपील पर विचार करने से इनकार किया और उसे खारिज किया।
Case Title : A v S

