मस्जिद होने के आधार पर RSS रूट मार्च की अनुमति नहीं रोक सकते, अल्पसंख्यकों को बदनाम न करें: मद्रास हाईकोर्ट
Praveen Mishra
15 Oct 2026 4:58 PM IST

मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार (15 अक्टूबर) को कहा कि राज्य पुलिस प्रस्तावित मार्ग पर मस्जिद या ईदगाह होने का हवाला देकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूट मार्च की अनुमति देने से इनकार नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि इस तरह के तर्क देकर मुस्लिम समुदाय को गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए।
जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन ने यह मौखिक टिप्पणी तमिलनाडु में RSS के प्रस्तावित रूट मार्च की अनुमति देने से इनकार किए जाने के खिलाफ संगठन की उत्तर तमिलनाडु इकाई के राज्य सचिव की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
राज्य सरकार की ओर से अनुमति अस्वीकार करने के लिए बताए गए कारणों पर गौर करते हुए अदालत ने पाया कि प्रस्तावित मार्ग पर मस्जिदों और ईदगाह की मौजूदगी को भी आधार बनाया गया था।
इस पर आपत्ति जताते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि राज्य को ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहिए, जिससे लगे कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जुलूस का विरोध करेंगे।
अदालत ने टिप्पणी की, “ईदगाह रमजान और बकरीद के दौरान सामूहिक रूप से इकट्ठा होकर नमाज पढ़ने के लिए होती है। क्या आप कह रहे हैं कि वे अक्टूबर में रमजान मनाएंगे? आप मुस्लिम समुदाय को बदनाम कर रहे हैं।”
अदालत ने अपने आदेश में भी कहा कि यह चिंता का विषय है कि पुलिस अधिकारी इस तरह कारण बता रहे हैं, मानो अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को याचिकाकर्ता के संगठन द्वारा निकाले जाने वाले जुलूस से कोई समस्या हो।
नागरिकों के अधिकार पुलिस की मर्जी पर नहीं छोड़े जा सकते: हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि नागरिकों के अधिकार पुलिस की मनमर्जी पर नहीं छोड़े जा सकते।
न्यायमूर्ति ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि राज्य सरकार हर चीज पुलिस के हवाले कर रही है, जबकि नागरिकों के अधिकारों को पुलिस की इच्छा और मनमर्जी के अधीन नहीं किया जा सकता।
पहले से तय दिशानिर्देशों के बावजूद वही कारण दोहराने पर नाराजगी
अदालत ने ध्यान दिलाया कि पूर्व में जस्टिस जी. जयचंद्रन ने भविष्य में RSS के रूट मार्च को लेकर अनावश्यक मुकदमेबाजी रोकने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे।
उन दिशानिर्देशों में मस्जिदों और चर्चों की मौजूदगी, यातायात बाधित होने की आशंका और अलग विचारधारा वाले संगठनों की मौजूदगी को अनुमति अस्वीकार करने के पर्याप्त कारण नहीं माना गया था। अदालत ने कहा कि पहले भी राज्य द्वारा दिए गए ऐसे कारणों को कमजोर बताते हुए खारिज किया जा चुका है।
पीठ ने कहा कि दिशानिर्देश जारी करने के बावजूद पुलिस ने फिर उन्हीं कारणों का सहारा लेकर अनुमति देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को उम्मीद थी कि दिशानिर्देशों के बाद इस तरह की अनावश्यक और निरर्थक मुकदमेबाजी से बचा जा सकेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता और राज्य, दोनों से आपसी सहयोग की अपेक्षा की गई थी, लेकिन यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। अदालत के अनुसार, इस मामले में लंबी सुनवाई करनी पड़ी, जबकि ऐसी मुकदमेबाजी होनी ही नहीं चाहिए थी।
गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने सवाल उठाया था कि जब RSS को जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी रूट मार्च की अनुमति दी गई है, तो तमिलनाडु में अनुमति देने से इनकार क्यों किया जा रहा है। अदालत ने पक्षों से शांतिपूर्ण आयोजन के लिए समाधान निकालने को कहा था।
RSS को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश
गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पिछले दिन राज्य के लोक अभियोजक जॉन सत्यन के साथ हुई बातचीत से कोई समाधान नहीं निकल सका।
इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह हलफनामा दाखिल कर प्रस्तावित मार्गों की सूची, आयोजन के प्रभारी व्यक्ति का विवरण और प्रतिभागियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराए।
अदालत ने RSS से यह वचन देने को भी कहा कि वह कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों का पूरी तरह पालन करेगा।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को पुलिस महानिदेशक (DGP) से निर्देश प्राप्त करने को कहा कि हलफनामा दाखिल किए जाने के बाद रूट मार्च की अनुमति देने के संबंध में क्या निर्णय लिया जा सकता है।
अदालत ने मामले की सुनवाई शुक्रवार के लिए स्थगित कर दी।
मामले में अगली सुनवाई पर नजर रहेगी कि RSS द्वारा हलफनामा दाखिल किए जाने के बाद राज्य सरकार रूट मार्च की अनुमति देने पर क्या रुख अपनाती है।

