हाईकोर्ट की 5 जजों की बेंच का अहम फैसला: अपील पेंडिंग होने की वजह से कैदियों की अस्थायी रिहाई को अनिश्चित काल के लिए रोका नहीं जा सकता

Shahadat

24 Jun 2026 10:41 AM IST

  • हाईकोर्ट की 5 जजों की बेंच का अहम फैसला: अपील पेंडिंग होने की वजह से कैदियों की अस्थायी रिहाई को अनिश्चित काल के लिए रोका नहीं जा सकता

    मद्रास हाईकोर्ट की 5 जजों की बेंच ने हाल ही में कहा कि छुट्टी (Leave) और अस्थायी रिहाई मानवीय गरिमा का हिस्सा हैं, जिन्हें सिर्फ़ अपील पेंडिंग होने की वजह से अनिश्चित काल के लिए रोका नहीं जा सकता। [2026 LiveLaw (Mad) 276]

    कोर्ट ने कहा,

    "हमें फिर से यह दोहराना होगा कि जेल में बंद होने का मतलब यह नहीं है कि मौलिक अधिकार सिर्फ़ 'कागज़ी वादे' बनकर रह जाएं... इन अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 226 के तहत इस कोर्ट की शक्ति हमारे संविधान के मूल ढांचे का एक अटूट हिस्सा है... इसलिए हमारी राय है कि छुट्टी और अस्थायी रिहाई मानवीय गरिमा के पहलू हैं, जिन्हें सिर्फ़ न्यायिक अपील पेंडिंग होने की वजह से अनिश्चित काल के लिए रोका नहीं जा सकता।"

    चीफ जस्टिस एस.ए. धर्माधिकारी, जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन, जस्टिस ए.डी. जगदीश चंदिरा, जस्टिस एम. निर्मल कुमार और जस्टिस सुंदर मोहन की बेंच ने कानून के निम्नलिखित सवाल पर फैसला करने के लिए भेजे गए मामले की सुनवाई करते हुए ये बातें कहीं:

    1) क्या तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ़ सेंटेंस रूल्स, 1982 के तहत किसी कैदी को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत छुट्टी दी जा सकती है, जब उसकी सज़ा के खिलाफ़ अपील माननीय सुप्रीम कोर्ट या इस कोर्ट के सामने पेंडिंग हो?

    2) क्या तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ़ सेंटेंस रूल्स, 1982 के नियम 40 के तहत छूट देने की शक्ति का इस्तेमाल राज्य सरकार द्वारा किसी कैदी को उन नियमों के दायरे से बाहर छुट्टी देने के लिए किया जा सकता है, जब उसकी सज़ा के खिलाफ़ अपील माननीय सुप्रीम कोर्ट या इस कोर्ट के सामने पेंडिंग हो?

    यह सवाल K.M.Nanavati v. State of Bombay (AIR 1961 SC 112) मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के संदर्भ में पूछा गया। पिछले साल नवंबर में हाईकोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि वह इस मामले को चीफ जस्टिस के सामने रखे ताकि एक बड़ी बेंच बनाई जा सके। ऐसा 2011 और 2025 में 3-जजों की दो फुल बेंचों के अलग-अलग फैसलों को देखते हुए किया गया।

    बेंच ने गौर किया कि 2011 में 'स्टेट बनाम येसु' मामले में फुल बेंच ने कहा था कि प्रशासनिक कार्रवाई के ज़रिए पैरोल पर अस्थायी रिहाई और 'तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ़ सेंटेंस रूल्स' के तहत सज़ा को सस्पेंड करके अस्थायी रिहाई, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। फुल बेंच ने कहा कि सज़ा को सस्पेंड करने के नियमों के दायरे से बाहर किसी कैदी को सज़ा सस्पेंड करने की सुविधा नहीं दी जा सकती।

    हालांकि, 2025 में 'टी. रामलक्ष्मी बनाम स्टेट' मामले में एक और फुल बेंच ने कहा कि 'तमिलनाडु सस्पेंशन ऑफ़ सेंटेंस रूल्स 1982' के नियम 35 के अनुसार, जेल प्रशासन को सामान्य छुट्टी देने का अधिकार है। लेकिन कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर कैदी पर किसी दूसरे मामले में मुकदमा चल रहा है तो जेल प्रशासन उसकी छुट्टी की अर्ज़ी को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर सकता है।

    इस मामले पर जवाब देते हुए 5-जजों की बेंच ने कहा कि 1982 के नियम उन सभी कैदियों पर लागू होंगे जिन पर मुकदमा नहीं चल रहा है और कुछ कैदियों को यह लाभ न देना 1982 के नियमों में तय की गई अपवाद वाली सीमा को नकारने जैसा होगा।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमारी शुरुआती राय है कि 1982 के नियम सभी तरह के कैदियों (जिनमें अपील के चरण वाले कैदी भी शामिल हैं) के लिए सुधारात्मक छुट्टी का एक असरदार ज़रिया बने हुए हैं। कैदियों को 1982 के नियमों का लाभ न देना, 1982 के नियमों के नियम 35 में तय की गई साफ अपवाद वाली सीमा को नज़रअंदाज़ करने जैसा होगा।"

    कोर्ट ने गौर किया कि 2011 के फैसले में इस सवाल पर कभी विचार नहीं किया गया कि क्या अपील लंबित रहने के दौरान कैदी को छुट्टी दी जा सकती है। कोर्ट ने देखा कि पिछले फैसले में सिर्फ़ यह कहा गया कि 1982 के नियमों के तहत छुट्टी को सिर्फ़ सज़ा का सस्पेंशन माना जा सकता है, पैरोल नहीं।

    कोर्ट ने यह भी देखा कि यह मुद्दा अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित है, जहां सुप्रीम कोर्ट "पूरे देश के लिए एक जैसी" (पैन-इंडिया) नीति की संभावना पर विचार कर रही है। इसलिए जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई फ़ैसला नहीं ले लेता, तब तक कोर्ट ने कहा कि 2025 का फ़ैसला ही लागू रहेगा और उसी के आधार पर छुट्टी दी जाएगी।

    कोर्ट ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सामान्य और आपातकालीन छुट्टी के आवेदनों पर 1982 के नियमों और 2025 के आदेश के अनुसार कार्रवाई करें।

    Case Title: Sheefa Rani v The Secretary to Government

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