एक-तरफ़ा गुज़ारा-भत्ता आदेश जारी करने से पहले WhatsApp/ईमेल सर्विस का वेरिफ़िकेशन ज़रूरी: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
24 July 2026 9:20 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि फ़ैमिली कोर्ट WhatsApp और ईमेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भेजे गए नोटिस की डिलीवरी की पुष्टि किए बिना एक-तरफ़ा (ex-parte) आदेश पारित नहीं कर सकता। [2026 LiveLaw (MP) 295]
इलेक्ट्रॉनिक सर्विस के वेरिफ़िकेशन में विफलता को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हुए जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने एक-तरफ़ा गुज़ारा-भत्ता आदेश रद्द किया।
कोर्ट ने कहा,
"WhatsApp या ईमेल सर्विस की स्थिति का पता लगाने में विफलता प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की जड़ पर प्रहार करती है। इसलिए विवादित आदेश में स्पष्ट अवैधता और प्रक्रियात्मक अनियमितता है, जिसके कारण न्याय के गर्भपात (miscarriage of justice) को रोकने के लिए इस कोर्ट को अपने रिविज़नल अधिकार क्षेत्र (revisional jurisdiction) के तहत हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है।"
फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए क्रिमिनल रिविज़न याचिका दायर की गई, जिसमें पति (रिविज़निस्ट) को CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को ₹10,000 का मासिक गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया। रिविज़निस्ट ने तर्क दिया कि कार्यवाही बिना नोटिस तामील हुए एक-तरफ़ा (ex-parte) रूप से की गई।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि विचार करने के लिए मुख्य मुद्दा यह था कि क्या फ़ैमिली कोर्ट ने एक-तरफ़ा कार्यवाही करने और विवादित आदेश पारित करने से पहले याचिकाकर्ता पर नोटिस की तामील (service of notice) को ठीक से सुनिश्चित किया।
कोर्ट ने पाया कि CrPC की धारा 125 के तहत आवेदन में पत्नी ने पहली सुनवाई पर प्रोसेस फ़ीस का भुगतान किया। इसके बाद पति को नोटिस जारी किए गए, लेकिन वे बिना तामील हुए वापस आ गए क्योंकि वह घर पर नहीं था। इसलिए कोर्ट ने WhatsApp और ईमेल तथा RAD मोड के माध्यम से तामील की अनुमति दी थी।
कोर्ट ने पाया कि फ़ैमिली कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से संबंधित सर्विस रिपोर्ट की पुष्टि किए बिना मामले में कार्यवाही की और पति को एक-तरफ़ा (ex-parte) घोषित किया।
फ़ैमिली कोर्ट की कार्रवाई को "गंभीर अनियमितता" बताते हुए, कोर्ट ने रिविज़न याचिका को मंज़ूरी दी और मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया।
Case Title: WK v AK, Cr.R. NO. 4141/2024


