कानूनी संशोधनों को पिछली तारीख से लागू करके लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारी के नियमितीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Shahadat

29 April 2026 9:45 AM IST

  • कानूनी संशोधनों को पिछली तारीख से लागू करके लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारी के नियमितीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कानूनी संशोधनों को पिछली तारीख से लागू करके उस कर्मचारी के हासिल अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता, जो दशकों से लगातार सेवा कर रहा है।

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने यह टिप्पणी की:

    "हालांकि, इस कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 1989 में सेवा में आया था और 2016 का संशोधन लागू होने से काफी पहले ही उसने नियमितीकरण के लिए अपनी ज़रूरी सेवा अवधि पूरी कर ली थी। कानूनी संशोधनों को पिछली तारीख से लागू करके उस कर्मचारी के हासिल अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता, जो दशकों से लगातार सेवा कर रहा है।"

    याचिकाकर्ता ने दो याचिकाएं दायर की थीं; पहली में 'रिट ऑफ मैंडमस' (आदेश जारी करने वाली रिट) की मांग की गई, ताकि संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ता की सेवा को चपरासी के पद पर नियमित करने का निर्देश दिया जा सके। दूसरी में मार्च 2021 से वेतन का भुगतान न करने के लिए अधिकारियों के गैर-कानूनी रवैये को चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता को 1989 में दैनिक वेतन भोगी (डेली वेज) के तौर पर नियुक्त किया गया और उसने 30 साल तक लगातार सेवा की थी। इस पूरी अवधि के दौरान, अधिकारियों ने उसके वेतन से नियमित रूप से भविष्य निधि (PF) का योगदान काटा था। नियमितीकरण के लिए कई सिफारिशें किए जाने के बावजूद, कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया।

    इसलिए याचिकाकर्ता ने पहली याचिका दायर की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पहली याचिका दायर करने के बाद, ब्रांच मैनेजर ने केस वापस लेने के लिए उसे परेशान करना शुरू किया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मैनेजर ने ज़बरदस्ती उसे अपने काम करने से रोका और हाज़िरी रजिस्टर छिपा दिया ताकि वह उस पर दस्तखत न कर सके। इसके अलावा, मार्च 2021 से उसका वेतन भी रोक दिया गया।

    बैंक के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पास लेबर कोर्ट में जाने का एक वैकल्पिक कानूनी रास्ता मौजूद था। वकील ने आगे दलील दी कि 2016 की अधिसूचना के ज़रिए चपरासी के पद को 'खत्म हो रहे कैडर' (Dying Cadre) के तौर पर घोषित कर दिया गया, जिससे नियमितीकरण कानूनी तौर पर नामुमकिन हो गया।

    कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि हालांकि कोर्ट आमतौर पर अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने का निर्देश देने से बचते हैं। फिर भी 'स्पष्ट मनमानी' को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि सरकार एक 'आदर्श नियोक्ता' (Model Employer) के तौर पर काम करे, न्यायिक समीक्षा का दायरा हमेशा खुला रहता है।

    कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता के 30 साल के कार्यकाल, भविष्य निधि (PF) की कटौतियों और प्रशंसा पत्रों (Appreciation Letters) को देखते हुए उसका सेवा रिकॉर्ड ऐसा था, जिसे आसानी से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य के इस तर्क को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता को सिर्फ़ 89-दिन के एक्सटेंशन पर रखा गया। साथ ही कहा कि यह अनुचित श्रम प्रथाओं का एक क्लासिक उदाहरण है। यह तथ्य कि याचिकाकर्ता 30 सालों से लगातार काम कर रहा था और उसके प्रॉविडेंट फंड से नियमित रूप से कटौती हो रही थी, "89-दिन के अस्थायी जुड़ाव के भ्रम को तोड़ देता है"।

    इसके अतिरिक्त, बेंच ने कहा कि कोर्ट के आदेशों के बाद राज्य ने अन्य कर्मचारियों को नियमित किया था। हालांकि, याचिकाकर्ता को यही सुविधा न देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

    वेतन न दिए जाने के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा,

    "इस प्रकार, मार्च 2021 से वेतन का भुगतान न करना प्रतिवादी नंबर 4 और 5 द्वारा सत्ता का मनमाना, बदले की भावना से भरा और दिखावटी इस्तेमाल पाया गया। सेवा देने वाले किसी भी कर्मचारी को उसकी आजीविका से वंचित नहीं किया जा सकता, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है"।

    इस प्रकार, कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता नियमितीकरण का हकदार है।

    Case Title: Ramcharan v State of Madhya Pradesh [WP 17383 of 2019]

    Next Story