स्पष्ट कानूनी रोक न होने पर रेवेन्यू अथॉरिटी का फ़ैसला सिविल केस को नहीं रोकता, न ही 'रेस ज्यूडिकाटा' के तौर पर काम करता है: एमपी हाईकोर्ट
Shahadat
8 Oct 2026 9:39 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि एमपी लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 257 के तहत किसी सिविल केस को सिर्फ़ इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि उस मामले पर पहले रेवेन्यू अथॉरिटी ने फ़ैसला किया, खासकर तब जब मामला सिविल अधिकारों के फ़ैसले से जुड़ा हो। [2026 LiveLaw (MP) 407]
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि रेवेन्यू अथॉरिटी का फ़ैसला बाद में होने वाले सिविल केस में 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) के तौर पर काम नहीं कर सकता, जस्टिस दीपक खोट की बेंच ने कहा:
"इस कोर्ट की सोच यह है कि MPLRC की धारा 257 के तहत कोई साफ़ कानूनी रोक न होने पर किसी सिविल केस को सिर्फ़ इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि रेवेन्यू अथॉरिटी ने पहले उस मामले पर विचार किया रेवेन्यू अथॉरिटी का फ़ैसला अपने आप में बाद के सिविल केस में 'रेस ज्यूडिकाटा' के तौर पर काम नहीं करता, खासकर तब जब केस सिविल अधिकारों के फ़ैसले से जुड़ा हो। सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र CPC की धारा 9 से तय होता है, जो सिविल कोर्ट को सिविल प्रकृति के सभी केसों की सुनवाई करने का अधिकार देती है, सिवाय उन केसों के जिन पर कानून द्वारा साफ़ तौर पर या परोक्ष रूप से रोक लगाई गई हो"।
याचिकाकर्ता ने सिविल जज के उस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की, जिसमें Order 7 Rule 11 CPC के तहत उनकी अर्ज़ी खारिज कर दी गई। यह नियम कोर्ट को कुछ आधारों पर शुरुआती स्तर पर ही शिकायत (Plaint) को खारिज करने का अधिकार देता है।
मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता/प्रतिवादियों ने 10 मार्च, 2023 को एमपी लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 115 के तहत रेवेन्यू एंट्रीज़ में सुधार करवाया था। इस आदेश को दमोह के कलेक्टर ने 3 मई, 2023 को मंज़ूरी दी थी। उसके बाद सागर के एडिशनल कमिश्नर ने भी 20 अक्टूबर, 2025 को इस आदेश को मंज़ूरी दी।
इसके बाद प्रतिवादी नंबर 1 और 2 ने सक्षम रेवेन्यू अथॉरिटीज़ द्वारा पारित आदेशों को चुनौती देने और उन्हें रद्द करने के लिए ऊपर बताया गया सिविल केस दायर किया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने Order 7 Rule 11 का इस्तेमाल किया, जिसे सिविल जज ने खारिज किया। नाराज़ होकर वह रिविज़नल अधिकार क्षेत्र के तहत हाई कोर्ट गए।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एमपी लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 257(f) के तहत सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से वर्जित है। यह तर्क दिया गया कि रेवेन्यू अधिकारियों के समक्ष कार्यवाही में प्रतिवादियों को सुनवाई का उचित अवसर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि क्या प्रतिवादियों को सुनवाई का अवसर दिया गया, यह तथ्य का प्रश्न है और इसके लिए सबूतों का उचित मूल्यांकन आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रश्न का निर्णय सिविल कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए यह ऑर्डर 7 नियम 11 के तहत वाद-पत्र को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों द्वारा बताई गई कार्रवाई का कारण रेवेन्यू रिकॉर्ड से उनके नाम हटाने के आदेशों से संबंधित है, जो उनकी अनुपस्थिति में और उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किए गए।
इसलिए बेंच ने माना:
"वाद-पत्र को देखने पर ही ऐसी दलील प्रतिवादियों/वादी के पक्ष में कार्रवाई का कारण बताती है। इसलिए CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत आवेदन पर विचार करते समय इसे शुरुआती स्तर पर ही खारिज नहीं किया जा सकता है।"
बेंच ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता का मामला कोड की धारा 250 के एक अलग पहलू से संबंधित था, जिसमें यह माना गया कि यदि कोड के प्रावधानों के तहत कोई प्रभावी उपाय उपलब्ध है, तो आमतौर पर सिविल वाद नहीं चलाया जा सकता है। हालांकि, बेंच ने कहा कि वर्तमान वाद कोड की धारा 257 द्वारा शासित था और कहा कि उक्त वाद उक्त प्रावधान द्वारा वर्जित नहीं था।
बेंच ने कहा,
"वर्तमान मामले में शामिल मुद्दा कोड की धारा 257 के तहत परिकल्पित विशिष्ट वैधानिक रोक द्वारा शासित है। कोड की धारा 257 के प्रावधानों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने पर यह कोर्ट पाता है कि वर्तमान वाद उक्त प्रावधान द्वारा वर्जित नहीं है।"
तदनुसार, कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की दलील में कोई दम नहीं था। बेंच ने विवादित आदेश की पुष्टि की और याचिका खारिज की।
Case Title : Rajendra Jain v Jitendra Kurmi

