हाईकोर्ट ने सागर में ज़हरीली शराब से हुई मौतों की जांच की मांग वाली PIL का निपटारा किया, कहा- राज्य पहले ही कार्रवाई कर चुका है

  • हाईकोर्ट ने सागर में ज़हरीली शराब से हुई मौतों की जांच की मांग वाली PIL का निपटारा किया, कहा- राज्य पहले ही कार्रवाई कर चुका है

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार, 22 सितंबर को सागर ज़िले में ज़हरीली शराब से हुई मौतों की जांच की मांग करने वाली जनहित याचिका (PIL) का निपटारा किया। [2026 LiveLaw (MP) 383]

    यह देखते हुए कि राज्य ने पहले ही हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में आयोग का गठन कर दिया और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है, चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीज़न बेंच ने याचिका का निपटारा किया।

    खंडपीठ ने कहा,

    "फिलहाल, राज्य द्वारा उठाए गए कदमों से संतुष्ट होने के बाद कोर्ट इस मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं करना चाहता है। हालांकि, हम याचिकाकर्ता को एक स्वतंत्र व्यक्ति के तौर पर आयोग के सामने अपनी शिकायत रखने की अनुमति देते हैं, जो इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझाने में रुचि रखता है। इसलिए हम इस याचिका का निपटारा करते हैं।"

    मामले की पृष्ठभूमि

    भास्कर इंग्लिश की समाचार रिपोर्ट के अनुसार, सागर ज़िले के बुंडा और शाहगढ़ में लगभग 36 लोगों की मौत हुई। दो पुलिस स्टेशनों में 33 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई हैं और लगभग 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी पुलिस और प्रशासन को आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

    याचिका में दैनिक भास्कर की 7 सितंबर, 2026 की समाचार रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया गया कि आबकारी अधिकारियों ने घटना से ठीक एक दिन पहले ही मौतों के लिए ज़िम्मेदार शराब के खास ब्रांड को क्लीन चिट दे दी थी। इस प्रकार, याचिका ने शराब के निरीक्षण, सैंपलिंग, सत्यापन और मंज़ूरी की प्रक्रिया पर संदेह जताया।

    याचिका में बताया गया कि अगस्त 2026 में नकली शराब के बारे में शिकायतें मिली थीं, जिनमें खास तौर पर यह बताया गया कि "बॉम्बे" और "सागर गोल्ड" ब्रांड नामों से नकली शराब बेची जा रही थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।

    याचिका में 2020 से अलग-अलग ज़िलों में हुई ऐसी ही घटनाओं का भी ज़िक्र किया गया और कहा गया कि शराब के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री को नियंत्रित करने वाले मौजूदा नियामक, निवारक और प्रवर्तन तंत्रों की व्यापक जांच की ज़रूरत है।

    Case Title: Vaibhav Singh v State of Madhya Pradesh, WRIT PETITION (WP) 37587/2026

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