Land Revenue Code | सीमांकन की कार्यवाही से अप्रत्यक्ष लाभ लेने का मात्र आरोप आपराधिक षड्यंत्र नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Shahadat

3 April 2026 7:39 PM IST

  • Land Revenue Code | सीमांकन की कार्यवाही से अप्रत्यक्ष लाभ लेने का मात्र आरोप आपराधिक षड्यंत्र नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत सीमांकन की कार्यवाही से अप्रत्यक्ष लाभ लेने का मात्र आरोप ठोस सबूतों के अभाव में आपराधिक षड्यंत्र का निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं बन सकता।

    जस्टिस बीपी शर्मा की पीठ ने FIR दर्ज करने का निर्देश देने वाले ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया। पीठ ने टिप्पणी की कि यह आदेश यांत्रिक रूप से पारित किया गया था, क्योंकि 'मेंस रिया' (अपराधिक इरादे) का आवश्यक तत्व प्रदर्शित नहीं किया गया।

    पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया:

    "इसके अलावा, यह कोर्ट पाता है कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि पक्षों के बीच कोई 'मन की एकता' (Meeting of Minds) या समझौता हुआ, जो आपराधिक षड्यंत्र के अपराध का गठन कर सके। 'मेंस रिया' का आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है। याचिकाकर्ताओं द्वारा सीमांकन की कार्यवाही से किसी प्रकार का अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त करने का मात्र आरोप, कानून की दृष्टि से उन्हें किसी आपराधिक षड्यंत्र में शामिल मानने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता; विशेष रूप से तब, जब कोई ठोस सबूत मौजूद न हो।"

    यह मामला भू-राजस्व संहिता के तहत राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई सीमांकन और उसके बाद अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही से जुड़ा है। कंपनी द्वारा की गई आधिकारिक कार्रवाई के बाद ज़मीन का कब्ज़ा वापस दिला दिया गया। हालांकि, नरेंद्र जैन के कानूनी वारिसों (प्रतिवादी 2 से 5) ने दावा किया कि वे इस कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे। इसके बाद राजस्व अधिकारियों ने एक और कार्यवाही की, जिसमें भी प्रतिवादी 2 से 5 द्वारा किए गए अतिक्रमण के निष्कर्षों की पुष्टि हुई।

    बाद में प्रतिवादी 2 से 5 ने याचिकाकर्ताओं और कुछ राजस्व अधिकारियों के खिलाफ एक शिकायत दर्ज की, जिसमें उन्होंने रिकॉर्ड में हेराफेरी और अन्य अपराधों के आरोप लगाए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और उस आदेश तथा उसके परिणामस्वरूप शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

    याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह तर्क दिया कि राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई किसी भी सीमांकन कार्यवाही पर उनके हस्ताक्षर नहीं थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कोई विशिष्ट 'स्पष्ट कृत्य' (Overt Act) नहीं किया गया, और यह पूरा विवाद मूल रूप से दीवानी (Civil) प्रकृति का था।

    प्रतिवादियों के वकील ने यह तर्क दिया कि शिकायत में एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का होना दर्शाया गया, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने FIR दर्ज करने के लिए CrPC की धारा 156(2) के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया था।

    कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून का दुरुपयोग माना जाएगा। पीठ ने यह टिप्पणी की कि यह विवाद राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई सीमांकन की कार्यवाही से ही उत्पन्न हुआ था। सीमांकन रिपोर्ट एक आधिकारिक दस्तावेज़ है, जिसे सक्षम राजस्व अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन में तैयार किया जाता है। बेंच ने पाया कि प्रतिवादी यह दिखाने में विफल रहे कि ऐसी सीमांकन रिपोर्ट तैयार करने में याचिकाकर्ताओं की कोई भूमिका थी।

    बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि याचिकाकर्ता ने सीमांकन या म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही से संबंधित किसी भी आधिकारिक या अनौपचारिक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए। प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहे कि याचिकाकर्ताओं ने नरेंद्र जैन की स्थिति, उपस्थिति या मृत्यु के संबंध में प्राधिकरण को कोई अभ्यावेदन या सूचना दी थी।

    अतः, बेंच ने यह निर्णय दिया,

    "यह आरोप कि सीमांकन रिपोर्ट में एक मृत व्यक्ति को उपस्थित दिखाया गया था - भले ही इसे प्रथम दृष्टया स्वीकार भी कर लिया जाए - उन राजस्व अधिकारियों के आचरण से संबंधित है, जिन्होंने ऐसी रिपोर्ट तैयार की थी, न कि याचिकाकर्ताओं से।"

    बेंच ने आगे यह भी पाया कि याचिकाकर्ता और राजस्व अधिकारियों के बीच किसी भी प्रकार की मिलीभगत (Meeting of Minds) को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य मौजूद नहीं था। इस प्रकार, 'मेन्स रिया' (mens rea) यानी आपराधिक आशय का आवश्यक तत्व यहाँ अनुपस्थित था।

    इसके अतिरिक्त, बेंच ने यह माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा FIR दर्ज करने का निर्देश देने वाला जो आदेश पारित किया गया, वह बिना सोचे-समझे (बिना उचित विचार-विमर्श के) पारित किया गया। मजिस्ट्रेट इस बात पर विचार करने में विफल रहे कि क्या शिकायत में कथित अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद थे। अतः, यह माना गया कि उक्त आदेश केवल यांत्रिक रूप से (बिना किसी विवेक के) पारित किया गया।

    इसलिए बेंच ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार कर ली और FIR दर्ज करने का निर्देश देने वाला विवादित आदेश रद्द किया।

    Case Title: Pawan Mittal v State of Madhya Pradesh [MCRC-37442-2024]

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