अगर मुद्दे एक जैसे हों और फ़ैसला करने के लिए कॉमन सबूत काफ़ी हों, तो सिविल मुकदमों को एक साथ मिलाया जा सकता है: एमपी हाईकोर्ट

  • अगर मुद्दे एक जैसे हों और फ़ैसला करने के लिए कॉमन सबूत काफ़ी हों, तो सिविल मुकदमों को एक साथ मिलाया जा सकता है: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल मुकदमों को तभी एक साथ मिलाया जा सकता है जब उनमें शामिल मुद्दे एक जैसे हों और उन मुद्दों पर फ़ैसला करने के लिए कॉमन सबूत काफ़ी हों। [2026 LiveLaw (MP) 379]

    मुकदमों को एक साथ मिलाने की अर्ज़ी को खारिज करने वाले आदेश को चुनौती देने वाली रिविज़न याचिका खारिज करते हुए जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा:

    "इस तरह, दो मुकदमों को एक साथ मिलाया जा सकता है और मिलाया जाना चाहिए, जब उनमें शामिल मुद्दे एक जैसे हों (भले ही बिल्कुल एक न हों) और दोनों मुकदमों के लिए रिकॉर्ड किए गए कॉमन सबूत और कॉमन दलीलें मुकदमों पर फ़ैसला करने के लिए काफ़ी हों। जैसा कि ऊपर बताया गया, इस मामले में दोनों मुकदमों में शामिल मुद्दे अलग-अलग हैं। उनमें रिकॉर्ड किए जाने वाले सबूत भी अलग-अलग होंगे, क्योंकि एक मामले में सबूत पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे के बारे में होंगे और दूसरे मुकदमे (मुकदमों) में सबूत फ़र्म के लिक्विडेशन और उसके हिसाब-किताब के बारे में होंगे। इसलिए मुकदमों को एक साथ मिलाने की ज़रूरतें पूरी नहीं होती हैं।"

    आवेदक ने ग्वालियर के प्रिंसिपल जज के 23 जुलाई, 2026 के आदेश को चुनौती देते हुए एक रिविज़न याचिका दायर की। प्रिंसिपल जज ने सिविल मुकदमे नंबर 7A/18 और 701A/17 को एक साथ मिलाने और ग्वालियर में जूनियर डिवीज़न के सिविल जज के पास लंबित सिविल मुकदमा नंबर 445A/16 के साथ उनकी सुनवाई करने की अर्ज़ी को खारिज कर दिया।

    आवेदक के वकील ने कहा कि तीनों सिविल मुकदमे एक जैसे हैं और उनमें एक ही संपत्ति शामिल है। इसलिए आवेदक ने अनुरोध किया कि विवादित आदेश रद्द किया जाए और CPC की धारा 24 के तहत अर्ज़ी को मंज़ूरी दी जाए।

    बता दें, मुकदमा 445A अलग-अलग पैतृक पारिवारिक संपत्तियों के बंटवारे और हिस्सेदारी की घोषणा से संबंधित था। जबकि मुकदमा 07A ग्वालियर आइस फ़ैक्टरी के लिक्विडेशन और हिसाब-किताब के लिए है, और मुकदमा 701A ग्वालियर आइस फ़ैक्टरी के लिक्विडेशन और हिसाब-किताब से संबंधित है।

    कोर्ट ने गौर किया कि जहां मुकदमा 07A और 701A पूरी तरह से एक ही फ़र्म के लिक्विडेशन और हिसाब-किताब से संबंधित थे, उन्हें एक साथ मिलाया जा सकता था, जो पहले ही किया जा चुका था। हालांकि, केस 445A कई पारिवारिक संपत्तियों के बंटवारे से जुड़ा था। इसलिए केस की वजह, मुख्य कानूनी उपाय और इसमें शामिल पक्ष पहले बताए गए केसों से अलग हैं।

    बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया,

    "प्रिंसिपल जज का यह कहना सही है कि अगर सिविल जज के पास चल रहे दो सिविल केसों को डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट में चल रहे सिविल केस के साथ मिला दिया जाए तो सिविल जज के सामने मौजूद पक्षों का एक अपील का अधिकार खत्म हो जाएगा। अगर केस का विषय और मांगी गई राहत एक ही है तो सिर्फ़ इस आधार पर केसों को मिलाने से इनकार नहीं किया जा सकता।"

    हालांकि, इस मामले में कोर्ट ने पाया कि शामिल सिविल केसों की वजह या मांगी गई राहत एक जैसी नहीं है। इसलिए, कुछ पक्षों को अपील के अधिकार से वंचित करना सही नहीं होगा।

    चितिवलासा जूट मिल्स बनाम जेपी रीवा सीमेंट [2004 3 SCC 85] केस का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि केसों को तब मिलाया जा सकता है, जब इससे पक्षों को कई कानूनी कार्यवाही से बचाया जा सके।

    इसलिए बेंच ने माना कि मौजूदा केस के मुद्दे एक जैसे नहीं थे और इसलिए उन सिविल केसों पर फ़ैसला करने के लिए ज़रूरी सबूत भी अलग-अलग होंगे। इस तरह विवादित आदेश सही है और उसमें किसी दखल की ज़रूरत नहीं है। नतीजतन, रिविज़न याचिका खारिज की गई।

    Case Title: Praveen Bhargava v Piyush Bhargava, CR-1059-2026

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