काले हिरणों की मौत का मामला | ज़मानत खारिज होने के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दोहराया

Shahadat

13 May 2026 8:00 PM IST

  • काले हिरणों की मौत का मामला | ज़मानत खारिज होने के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दोहराया

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने दो काले हिरणों की मौत से जुड़े मामले में अपनी अवैध हिरासत का आरोप लगाया था। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसी याचिका तब स्वीकार्य नहीं है, जब याचिकाकर्ता की ज़मानत अर्जी पहले ही इस कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी हो।

    जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की:

    "मौजूदा मामले में भी, जैसा कि ऊपर बताया गया, याचिकाकर्ता की ज़मानत अर्जी (यानी M.Cr.C. No.5598 of 2026) को हाईकोर्ट ने 26.02.2026 के आदेश के ज़रिए पहले ही खारिज किया। अब यह याचिका बंदी प्रत्यक्षीकरण की प्रकृति वाली रिट जारी करने की मांग के साथ दायर की गई, जो कानून की नज़र में स्वीकार्य नहीं है।"

    याचिकाकर्ता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया और यह दलील दी कि उसे राज्य द्वारा अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।

    तथ्यों के अनुसार, दिसंबर 2024 में सलमान, इम्तियाज़ और जौहर हुसैन सहित तीन लोगों को 64.70 किलोग्राम मांस के साथ पकड़ा गया। यह मांस संरक्षित वन्यजीव प्रजातियों, विशेष रूप से काले हिरणों और चिंकारा का था। अधिकारियों ने उनके कब्ज़े से एक देसी पिस्तौल (कारतूसों के साथ), एक मोबाइल फोन और एक वाहन भी बरामद किया। इसके बाद आरोपियों के मेमोरेंडम बयानों के आधार पर याचिकाकर्ता को 27 अक्टूबर, 2025 को गिरफ्तार कर लिया गया।

    याचिकाकर्ता के वकील ने यह दलील दी कि उससे कोई बरामदगी नहीं हुई थी। उसे केवल सह-आरोपियों के बयानों के आधार पर ही इस मामले में फंसाया गया। इसके अलावा, वकील ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को उसकी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में सूचित नहीं किया गया था, जबकि कानून के तहत ऐसी जानकारी देना अनिवार्य है।

    राज्य सरकार के वकील ने इस याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि यह याचिका स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि याचिकाकर्ता की हिरासत को अवैध नहीं कहा जा सकता। बेंच ने पाया कि गिरफ़्तारी के बाद याचिकाकर्ता ने ज़मानत अर्ज़ी दायर की थी, जिसे फ़रवरी 2026 में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "उक्त आदेश से यह पता चलता है कि मौजूदा याचिकाकर्ता एक वीडियो क्लिप में दो मृत काले हिरणों के साथ दिखा था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता अवैध हिरासत में है, क्योंकि सभी ज़रूरी प्रक्रियाओं का पालन किया गया।"

    इन परिस्थितियों में कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि याचिकाकर्ता की न्यायिक हिरासत को अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता।

    सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले 'स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश बनाम कुसुम साहू' पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि एक बार जब कोई आरोपी किसी वैध न्यायिक आदेश के तहत न्यायिक हिरासत में होता है तो सिर्फ़ इसलिए 'हैबियस कॉर्पस' की रिट याचिका स्वीकार्य नहीं होती कि उसे ज़मानत नहीं मिली।

    तदनुसार, बेंच ने याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह ट्रायल कोर्ट के सामने अपने सभी उपलब्ध आधार पेश कर सकता है।

    Case Title: Sabha Antulay v State of Madhya Pradesh, WP-15777-2026

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