26 साल का कानूनी विवाद: अगर पहले का फैसला अधूरा रहा हो तो 'रेस ज्यूडिकाटा' लागू नहीं होगा- एमपी हाईकोर्ट
Shahadat
24 Aug 2026 9:55 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि CPC की धारा 11 के तहत 'रेस ज्यूडिकाटा' का सिद्धांत वहां लागू नहीं होगा जहां विचार के लिए भेजी गई कार्यवाही बिना फैसले के रह गई और मामले का निपटारा अधूरा रहा। [2026 LiveLaw (MP) 339]
अपीलकर्ता को नगर निगम के राजस्व विभाग में दिहाड़ी कर्मचारी के तौर पर नियुक्त किया गया, लेकिन उसकी सेवाएं 'गैर-कानूनी' तरीके से खत्म कर दी गईं। 1999 में हाईकोर्ट में दायर उसकी रिट याचिका पर मामले को विचार के लिए कलेक्टर के पास वापस भेजा गया, लेकिन उन्होंने आज तक मामले का निपटारा नहीं किया।
इस प्रकार, जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा,
"जब मामले को विचार के लिए कटनी नगर निगम के कमिश्नर के पास भेजा गया तो कमिश्नर ने उस पर विचार नहीं किया। इसलिए मामले का निपटारा अधूरा रहा। ऐसी स्थिति में 'रेस ज्यूडिकाटा' लागू नहीं होगा, और रिट कोर्ट ने 'रेस ज्यूडिकाटा' के आधार पर विवाद का फैसला करने में गलती की।"
अपीलकर्ता ने 16 जनवरी, 2024 के आदेश के खिलाफ दो रिट अपीलें दायर की थीं, जिसमें प्रतिवादी नंबर 2 (कटनी नगर निगम) की याचिका स्वीकार की गई और अपीलकर्ता की याचिका 'रेस ज्यूडिकाटा' के आधार पर खारिज कर दी गई।
अपीलकर्ता के अनुसार, उसने अपनी सेवा खत्म होने से पहले लगातार 240 दिनों से अधिक समय तक काम किया। उसने तर्क दिया कि उसकी सेवाएं श्रम कानूनों के अनिवार्य प्रावधानों का पालन किए बिना खत्म कर दी गईं। उसने आगे तर्क दिया कि उससे जूनियर कई कर्मचारी, जिनकी सेवाएं भी उसी आदेश से खत्म की गईं, उन्हें बाद में बहाल कर दिया गया।
अपीलकर्ता ने शुरू में 1999 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां मामले को नगर निगम के कमिश्नर के पास वापस भेजा गया। हालांकि, उन्होंने मामले का निपटारा नहीं किया।
इसके बाद कर्मचारी लेबर कोर्ट गया, जिसने उसे बहाल करके राहत दी लेकिन पिछली बकाया मजदूरी (back wages) नहीं दी।
नगर निगम ने रिट कोर्ट के सामने लेबर कोर्ट के फैसले को चुनौती दी, जबकि अपीलकर्ता ने पिछली बकाया मजदूरी न मिलने के खिलाफ राहत मांगी। रिट कोर्ट ने कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही को स्वीकार कर लिया और 'रेस ज्यूडिकाटा' के आधार पर उसकी याचिका खारिज की। अपीलकर्ता के सीनियर वकील ने तर्क दिया कि रिट कोर्ट ने लेबर कोर्ट का आदेश रद्द करके गंभीर गलती की है, जबकि अपीलकर्ता जैसी स्थिति वाले अन्य लोगों को नौकरी पर वापस ले लिया गया। इसलिए अपीलकर्ता भी उसी लाभ का हकदार है।
प्रतिवादी के वकील ने इन तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि रिट कोर्ट का फैसला सही और उचित था।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"यह एक ऐसा मामला है, जिसमें अपीलकर्ता/कर्मचारी अपने मामले का निपटारा कराने के लिए पिछले 26 वर्षों से अधिक समय से दर-दर भटक रहा है।"
बेंच ने गौर किया कि अपीलकर्ता कोर्ट गया, लेकिन मामले को म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के कमिश्नर के पास भेजा गया, जिस पर कोई विचार नहीं किया गया। इस तरह, हालात से मजबूर होकर अपीलकर्ता लेबर कोर्ट गया।
अपीलकर्ता लेबर कोर्ट में सफल रहा, जिससे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन को रिट कोर्ट में जाना पड़ा। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता या म्युनिसिपल कॉरपोरेशन द्वारा शुरू की गई कार्यवाही CPC की धारा 11 के दायरे में नहीं आती है, जो 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) का नियम तय करती है। इसका मतलब है कि अगर किसी सक्षम कोर्ट ने किसी मामले या मुद्दे पर सीधे और मुख्य रूप से फैसला सुना दिया तो कोई अन्य कोर्ट उस पर नया मुकदमा नहीं चला सकता या उस मुद्दे पर सुनवाई नहीं कर सकता।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि जब मामले को विचार के लिए कमिश्नर के पास भेजा गया तो उस पर विचार नहीं किया गया। इसलिए मामले का निपटारा अधूरा रह गया।
इस प्रकार, बेंच ने दोनों अपीलों को स्वीकार कर लिया और विवादित आदेशों को रद्द किया। बेंच ने दोनों पक्षों को रिट कोर्ट के सामने पेश होने और रिट कोर्ट को मामले में तेजी लाने का निर्देश भी दिया।
Case Title: Vinod Kumar Badgaiyan v State of Madhya Pradesh, WA-656-2024


