संवैधानिक लोकतंत्र में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं: केरल हाईकोर्ट
Shahadat
4 Nov 2026 9:37 AM IST

केरल हाईकोर्ट ने 2017 के फैसले को दोहराते हुए कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में, विशेष रूप से शैक्षणिक संस्थानों में, धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं है।
अदालत ने कहा कि जो छात्र किसी शैक्षणिक संस्थान में ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, उन्हें संस्थान से निकाला (Expelled) या निलंबित (Rusticated) किया जा सकता है।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा एस. की खंडपीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने सिंगल जज का अंतरिम आदेश रद्द किया। इस आदेश के तहत कलाडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के 16 निलंबित छात्रों को 4 नवंबर से शुरू होने वाली सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दी गई थी।
खंडपीठ ने 'डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक' मामले में अपने 2017 के फैसले का हवाला दिया। उस मामले में खंडपीठ ने कहा था कि शैक्षणिक संस्थान शिक्षा देने के लिए होते हैं, न कि राजनीति करने के लिए।
खंडपीठ ने कहा,
"डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक व अन्य [2017 (5) KHC 215] मामले में इस अदालत की एक खंडपीठ ने कहा था कि संवैधानिक लोकतंत्र में, और शैक्षणिक संस्थानों में तो बिल्कुल भी नहीं, धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं है। जो कोई भी किसी शैक्षणिक संस्थान में ऐसी गतिविधियों में शामिल होता है, उसे संस्थान से निकाला या निलंबित किया जा सकता है। शैक्षणिक संस्थान शिक्षा देने के लिए होते हैं, न कि राजनीति के लिए। राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते किसी शैक्षणिक संस्थान को बंधक नहीं बना सकते, और न ही सभ्य छात्रों के शिक्षा पाने के अधिकार में बाधा डाल सकते हैं।"
खंडपीठ ने 2017 के उस फैसले के कुछ हिस्सों का भी जिक्र किया, जिसमें 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के भाषण का हवाला दिया गया था। उस भाषण में डॉ. अंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को अपनाने की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि जब संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हों, तब सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह का सहारा लेना 'अराजकता का व्याकरण' (Grammar of Anarchy) है।
ये टिप्पणियां विश्वविद्यालय, उसके सिंडिकेट और कुलपति (वाइस-चांसलर) द्वारा दायर एक रिट अपील के दौरान सामने आईं। इस अपील में 30 अक्टूबर के सिंगल जज के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई। उस आदेश में विश्वविद्यालय को निर्देश दिया गया कि वह निलंबित छात्रों से परीक्षा शुल्क स्वीकार करे और उन्हें परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दे, जो उनकी रिट याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन होगा।
13 अगस्त को परिसर (कैंपस) में कथित तौर पर हुई घटनाओं की जांच लंबित रहने के दौरान, विश्वविद्यालय ने 1 सितंबर 2026 के एक आदेश के जरिए 16 छात्रों को निलंबित कर दिया था। इन छात्रों ने अपने निलंबन को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
विश्वविद्यालय ने इन घटनाओं की जांच के लिए एक जांच समिति गठित की थी और निलंबित छात्रों के परिसर में प्रवेश पर रोक लगाई थी; उन्हें केवल जांच कार्यवाही में शामिल होने के लिए तय तारीखों पर ही परिसर में आने की अनुमति थी।
छात्रों का तर्क था कि उनका लंबा निलंबन गैर-कानूनी है और इसके कारण वे कक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, जिससे उन्हें गंभीर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है। उन्होंने दलील दी कि निलंबन के कारण उपस्थिति (अटेंडेंस) में जो कमी आई है, उसके आधार पर उन्हें परीक्षाओं में बैठने के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि छात्र निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते हैं, जिनमें न्यूनतम उपस्थिति और आंतरिक परीक्षाओं को सफलतापूर्वक पास करना शामिल है। विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि छात्रों ने विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार उपस्थिति की कमी को माफ कराने (Condonation) के लिए कोई आवेदन जमा नहीं किया था।
डिवीजन बेंच ने पाया कि छात्रों द्वारा दायर रिट याचिका में ऐसे तर्क और सहायक दस्तावेज नहीं थे, जो परीक्षाओं में बैठने के लिए उनकी पात्रता को साबित कर सकें। बेंच ने गौर किया कि किसी भी छात्र ने उपस्थिति की कमी को माफ कराने के लिए जरूरी आवेदन जमा नहीं किए, और न ही उनके साथ कोई सहायक दस्तावेज या संबंधित विभागाध्यक्षों (HODs) या केंद्र निदेशकों की सिफारिशें संलग्न की थीं।
अदालत ने माना कि सिंगल जज के अंतरिम आदेश ने रिट याचिका में मांगी गई मुख्य राहत ही दे दी, जबकि यह जांचा ही नहीं गया कि छात्र पात्रता की शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं।
अदालत ने टिप्पणी की कि अदालतें विश्वविद्यालयों या अन्य प्राधिकरणों को ऐसे निर्देश नहीं दे सकतीं, जो वैधानिक प्रावधानों या नियमों के खिलाफ हों।
बेंच ने 'प्रिंसिपल, आईईएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग बनाम अनस पी.एम.' मामले में डिवीजन बेंच के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि निलंबन के कारण उपस्थिति में कमी आना एक ऐसा परिणाम है, जिसे छात्रों को अनिवार्य रूप से भुगतना ही पड़ेगा।
Case Title : Sree Sankaracharya University of Sanskrit v Archana P.S and Ors.

