केरल हाईकोर्ट का फैसला: LLM डिग्री वाले सीधे भर्ती जिला जजों को 1 जुलाई 1996 से मिलेगी तीन अग्रिम वेतन वृद्धि
Praveen Mishra
4 Nov 2026 3:45 PM IST

केरल हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि बार से सीधे भर्ती हुए और कानून में पोस्टग्रेजुएट डिग्री (LLM) रखने वाले जिला न्यायाधीश तीन अग्रिम वेतन वृद्धि (Advance Increments) पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि यह लाभ 1 जुलाई 1996 से दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत लाभ केवल भविष्य से प्रभावी किया गया था।
जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की खंडपीठ ने सेवानिवृत्त जिला जज एवं केरल हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एवी रामकृष्ण पिल्लई की रिट अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।
क्या था मामला?
यह विवाद प्रथम राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग यानी शेट्टी आयोग (Shetty Commission) की सिफारिशों से जुड़ा था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उच्च शैक्षणिक योग्यता, विशेषकर कानून में पोस्टग्रेजुएट डिग्री रखने वाले सिविल जजों को तीन अग्रिम वेतन वृद्धि देने की सिफारिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 21 मार्च 2002 को कुछ संशोधनों के साथ इन सिफारिशों को मंजूरी दी थी। इसके बाद केरल सरकार ने 28 मार्च 2007 को इन्हें स्वीकार किया। पात्र मुंसिफ/मजिस्ट्रेट को यह लाभ 1 जुलाई 1996 से दिया गया।
बाद में सवाल उठा कि क्या कानून में पोस्टग्रेजुएट डिग्री रखने वाले बार से सीधे भर्ती जिला न्यायाधीश भी इस लाभ के हकदार होंगे।
इस संबंध में हाईकोर्ट की जजों की वित्त समिति ने 9 जुलाई 2013 को माना कि ऐसे जिला न्यायाधीशों को भी तीन अग्रिम वेतन वृद्धि मिलनी चाहिए। समिति ने कहा कि उन्हें इस लाभ से बाहर रखना भेदभावपूर्ण होगा।
राज्य सरकार ने 22 नवंबर 2013 को इस लाभ को सैद्धांतिक मंजूरी दी, लेकिन इसे केवल भविष्य में प्रभावी करने की शर्त रखी। सरकार ने यह भी कहा कि यह लाभ कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि रियायत के तौर पर दिया गया है।
पूर्व जिला जज ने दायर की अपील
अपीलकर्ता जस्टिस एवी रामकृष्ण पिल्लई वर्ष 1995 में सीधे भर्ती होकर जिला न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। नियुक्ति के समय उनके पास कानून में पोस्टग्रेजुएट डिग्री थी।
हालांकि, सरकार के आदेश में तय की गई कट-ऑफ तारीख के कारण उन्हें तीन अग्रिम वेतन वृद्धि का लाभ नहीं मिला। उन्होंने 1 जुलाई 1996 से लाभ देने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, लेकिन सिंगल जज ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि सरकार किसी नए लाभ के लिए कट-ऑफ तारीख निर्धारित कर सकती है। इसके बाद उन्होंने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
खंडपीठ ने कहा कि शेट्टी आयोग ने भले ही सीधे भर्ती जिला न्यायाधीशों का विशेष उल्लेख नहीं किया था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें लाभ से बाहर रखने का इरादा था।
कोर्ट ने सरकार के इस तर्क पर सवाल उठाया कि तीन अग्रिम वेतन वृद्धि केवल रियायत के तौर पर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह कोई नई रियायत नहीं, बल्कि शेट्टी आयोग की सिफारिशों का ही विस्तार था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब सरकार ने सीधे भर्ती जिला न्यायाधीशों की इस लाभ के प्रति पात्रता स्वीकार कर ली थी, तो विवाद केवल इसके प्रभावी होने की तारीख को लेकर था।
Dr. Kauser Edappagath v. State of Kerala (2017) और State of Rajasthan v. Ramesh Chandra Mundra (2019) के फैसलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट और राज्य सरकार को आपसी सहयोग और समन्वय से काम करना चाहिए।
खंडपीठ ने माना कि जब समान लाभ मुंसिफ-मजिस्ट्रेट को 1 जुलाई 1996 से दिया गया है, तो सीधे भर्ती जिला न्यायाधीशों को इससे वंचित रखने का कोई औचित्य नहीं है।
सरकार का आदेश रद्द
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 22 नवंबर 2013 के सरकारी आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें लाभ को केवल भविष्य से प्रभावी किया गया था। इसके बाद जारी उन सरकारी संचारों को भी रद्द कर दिया गया, जिनमें पूर्वव्यापी लाभ देने से इनकार किया गया था।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता और समान स्थिति वाले अन्य न्यायिक अधिकारी 1 जुलाई 1996 से तीन अग्रिम वेतन वृद्धि पाने के हकदार होंगे।

