कक्षा में अनुशासन के लिए छात्रा का हाथ खींचने पर शिक्षिका के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द: केरल हाईकोर्ट
Praveen Mishra
14 Oct 2026 2:24 PM IST

केरल हाईकोर्ट ने पांचवीं कक्षा की एक छात्रा का हाथ खींचने और उसे चोट लगने के आरोप में शिक्षिका के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि शिक्षिका का उद्देश्य छात्रा को परेशान करना या चोट पहुंचाना नहीं, बल्कि कक्षा में अनुशासन बनाए रखना था।
जस्टिस जॉबिन सेबेस्टियन ने कहा कि केवल इसलिए किसी शिक्षक के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता कि उसने संस्थान में अनुशासन बनाए रखने के लिए सुधारात्मक उपाय के रूप में मामूली दंड दिया।
'मामूली सुधारात्मक कार्रवाई के लिए शिक्षकों पर आपराधिक मुकदमा चलाने से शैक्षणिक संस्थानों का कामकाज प्रभावित होगा'
कोर्ट ने टिप्पणी की,“केवल इसलिए कि किसी शिक्षक ने बच्चे को सुधारने या संस्थान में अनुशासन बनाए रखने के लिए सुधारात्मक उपाय के रूप में मामूली दंड दिया है, उसे आपराधिक कार्यवाही का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि संस्थागत अनुशासन बनाए रखने के लिए सामान्य और न्यूनतम सुधारात्मक उपाय अपनाने पर शिक्षकों के खिलाफ किशोर न्याय अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमे चलाए जाएंगे, तो शैक्षणिक संस्थानों का प्रशासन और व्यवस्थित कामकाज प्रभावित होगा।”
क्या था मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता शिक्षिका पांचवीं कक्षा की क्लास टीचर थी। आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता छात्रा को चोट पहुंचाने के इरादे से उसका हाथ खींचा। इस दौरान छात्रा का पैर बेंच में उलझ गया, जिससे उसके दाहिने घुटने में चोट और दर्द हुआ।
इस मामले में शिक्षिका के खिलाफ किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 82(1), जो शारीरिक दंड से संबंधित है, और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, जो स्वेच्छा से चोट पहुंचाने की सजा से संबंधित है, के तहत आरोप लगाए गए थे।
इसके बाद शिक्षिका ने पथानामथिट्टा की अतिरिक्त सत्र अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।
शिक्षिका ने क्या दलील दी?
शिक्षिका की ओर से दलील दी गई कि छात्रा कक्षा में इधर-उधर दौड़ रही थी। उसने छात्रा को अपनी सीट पर बैठने के लिए कहा और इसी दौरान उसका हाथ पकड़कर खींचा। शिक्षिका के अनुसार, उसका उद्देश्य केवल कक्षा में अनुशासन बनाए रखना था। छात्रा को परेशान करने, उसके साथ दुर्व्यवहार करने या उसे चोट पहुंचाने की कोई मंशा नहीं थी।
उन्होंने यह भी कहा कि घटना के एक महीने से अधिक समय बाद मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा, उपचार प्रमाणपत्र घटना के लगभग तीन महीने बाद प्राप्त किया गया था। शिक्षिका के अनुसार, घटना के आसपास छात्रा का उपचार केवल बाह्य रोगी विभाग (OPD) में हुआ था।
हालांकि, सरकारी अभियोजक ने याचिका का विरोध किया।
शिक्षक की भूमिका पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षक की भूमिका केवल विद्यार्थियों को शिक्षा देने तक सीमित नहीं है। उन्हें विद्यार्थियों के चरित्र, व्यवहार और भविष्य को आकार देने के साथ-साथ उनका मार्गदर्शन करने और अनुशासन सिखाने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।
कोर्ट ने कहा कि इस जिम्मेदारी का निर्वहन सावधानी के साथ किया जाना चाहिए और बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
हालांकि, यदि कोई शिक्षक दुर्भावनापूर्ण मंशा से शारीरिक दंड देता है और इससे बच्चे के भविष्य या मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर एवं स्थायी प्रभाव पड़ता है, तो ऐसे मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही क्यों रद्द की?
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में लगाए गए आरोपों से शिक्षिका की कोई दुर्भावनापूर्ण मंशा सामने नहीं आती। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, शिक्षिका का उद्देश्य छात्रा को चोट पहुंचाना नहीं, बल्कि कक्षा में अनुशासन बनाए रखना था।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में लगाए गए अपराध प्रथम दृष्टया लागू नहीं होते। इसके बाद हाईकोर्ट ने शिक्षिका की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

