न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए वकीलों का आचरण भी महत्वपूर्ण: केरल हाईकोर्ट; युवा वकील के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं

  • न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए वकीलों का आचरण भी महत्वपूर्ण: केरल हाईकोर्ट; युवा वकील के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं

    केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि न्याय व्यवस्था की अखंडता केवल न्यायिक फैसलों की सटीकता पर ही नहीं, बल्कि उसमें भाग लेने वाले वकीलों की विश्वसनीयता, ईमानदारी और पेशेवर आचरण पर भी निर्भर करती है।

    जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक वकील के खिलाफ एकल न्यायाधीश के फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई थी।

    क्या था मामला?

    यह अपील 17 अगस्त, 2026 के एक फैसले से संबंधित थी। अपीलकर्ता ने रिट याचिका में मूल विवाद पर दिए गए फैसले को चुनौती नहीं दी, बल्कि अपने मुवक्किल की ओर से पेश हुए वकील के रूप में उसके खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग की।

    अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि एकल न्यायाधीश ने बिना पर्याप्त आधार के यह संकेत दिया था कि वकील ने अपने मुवक्किल के हलफनामे को जानबूझकर सत्यापित किया, जबकि वह उसकी सामग्री को गलत जानता था। वकील ने तर्क दिया कि किसी मुवक्किल के हलफनामे में दिए गए बयानों की सत्यता या असत्यता के लिए वकील को स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    यह भी कहा गया कि युवा वकील को पेशेवर जिम्मेदारियों के बारे में मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से की गई टिप्पणियां उसके भविष्य और पेशेवर करियर को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने या उनमें उचित संशोधन करने की मांग की गई।

    वकीलों को दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए: हाईकोर्ट

    खंडपीठ ने कहा कि वकील सामान्यतः अपने मुवक्किल के निर्देशों, उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और उसके द्वारा सत्यापित हलफनामों के आधार पर काम करते हैं। यदि वकील के पास मुवक्किल के बयानों की सत्यता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, तो उसे स्वतः दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

    हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकीलों को अदालत में दाखिल करने से पहले अपने मुवक्किल द्वारा दिए गए दस्तावेजों और उनकी सामग्री की जांच करनी चाहिए। यदि परिस्थितियों से किसी अनुचित आचरण या अदालत को गुमराह करने वाले बयान की आशंका होती है, तो वकील को सावधानी बरतनी चाहिए और आवश्यक तथ्यों का उचित खुलासा करना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए वकीलों का आचरण उच्चतम स्तर की निश्चितता, विश्वसनीयता, ईमानदारी और नैतिकता के अनुरूप होना चाहिए।

    मुवक्किल के हितों की रक्षा निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए

    बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों का कर्तव्य है कि वे अपने मुवक्किलों को अदालत, विरोधी वकील या अन्य पक्षों के प्रति अनुचित और भ्रामक तरीकों का सहारा लेने से रोकें।

    खंडपीठ ने यह भी कहा कि वकीलों को स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए, अपनी दलीलों में संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए और व्यक्तिगत हमलों या अनुचित टिप्पणियों से बचना चाहिए।

    कोर्ट ने टिप्पणी की:

    “एक वकील के लिए अपने मुवक्किल के हितों की उत्साहपूर्वक और निर्भीकता से रक्षा करना मौलिक आवश्यकता है, लेकिन यह निष्पक्ष तरीकों से होना चाहिए। उसे मुवक्किल का व्यक्तिगत विस्तार या उसका दूसरा रूप नहीं बन जाना चाहिए।”

    युवा वकील को मार्गदर्शन देना था उद्देश्य

    खंडपीठ ने कहा कि एकल न्यायाधीश के फैसले को समग्र रूप से पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है कि उसका उद्देश्य बार में नए और युवा वकील को उसके पेशेवर कर्तव्यों के बारे में मार्गदर्शन देना था। कोर्ट ने माना कि पहले के फैसले में इस्तेमाल की गई भाषा कठोर थी, लेकिन उसका उद्देश्य वकील को अपमानित करना नहीं, बल्कि उसे सावधान करना और उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाना था।

    हालांकि, खंडपीठ ने यह भी माना कि इन टिप्पणियों का वकील के भविष्य पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए कोर्ट ने एकल न्यायाधीश के फैसले के पैराग्राफ 5 में “It is well settled” शब्दों से शुरू होकर उस पैराग्राफ के अंत तक की टिप्पणियों को हटाने का निर्देश दिया।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैसले के बाकी सभी हिस्से यथावत रहेंगे।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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