पत्नी की मास्टर्स डिग्री या परमानेंट एलिमनी का दावा खारिज होना, CrPC की धारा 125 के तहत मेंटेनेंस से इनकार करने का आधार नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
Shahadat
29 Sept 2026 2:13 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत मेंटेनेंस का दावा सिर्फ़ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि तलाक की कार्यवाही में पत्नी का परमानेंट एलिमनी का दावा खारिज हो गया, या इस आधार पर कि उसके पास ऐसी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन है, जिससे वह अपनी आजीविका कमा सकती है।
जस्टिस डॉ. चिल्लाकुर सुमालथा ने एक पत्नी द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर रिवीजन याचिका मंज़ूरी की। फैमिली कोर्ट ने CrPC की धारा 125 के तहत केवल जोड़े के नाबालिग बच्चे को मेंटेनेंस दिया और पत्नी का दावा खारिज किया।
कोर्ट ने कहा,
"CrPC की धारा 125 के तहत शुरू की गई कार्यवाही में हुबली की फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज ने पाया कि याचिकाकर्ता नंबर 1 प्रतिवादी से मेंटेनेंस पाने की हकदार नहीं है, क्योंकि परमानेंट एलिमनी के तौर पर 10,00,000 रुपये का उसका दावा खारिज किया गया और उसने उस आदेश को चुनौती नहीं दी। यह भी देखा गया कि याचिकाकर्ता नंबर 1, जिसकी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन एम.ए. है, अपनी आजीविका कमा सकती है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"प्रतिवादी का भी यह कहना नहीं है कि याचिकाकर्ता नंबर 1 एक कामकाजी महिला है। इसलिए, सिर्फ़ इसलिए कि उसके पास एम.ए. की डिग्री है, उसे मेंटेनेंस देने से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही, जैसा कि पहले बताया गया, याचिकाकर्ता नंबर 1 को परमानेंट एलिमनी इसलिए नहीं दी गई, क्योंकि वह प्रतिवादी/पति की आर्थिक क्षमता और स्थिति साबित करने में विफल रही थी। इसलिए यह कोर्ट मानता है कि फैमिली कोर्ट को CrPC की धारा 125 के तहत उसके द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में मेंटेनेंस के उसके दावे को खारिज नहीं करना चाहिए। इसलिए यह कोर्ट मानता है कि याचिकाकर्ता नंबर 1 प्रतिवादी/पति से मेंटेनेंस का दावा करने की हकदार है।"
याचिकाकर्ता-पत्नी ने पहले क्रूरता और परित्याग (छोड़ देने) के आधार पर शादी खत्म करने के लिए अर्ज़ी दी थी और 10 लाख रुपये की परमानेंट एलिमनी की मांग की। फ़ैमिली कोर्ट ने तलाक तो मंज़ूर कर लिया, लेकिन परमानेंट एलिमनी (स्थायी गुज़ारा-भत्ता) की मांग को यह कहते हुए खारिज किया कि वह पति की उतनी रकम देने की आर्थिक क्षमता साबित करने में नाकाम रहीं।
इसके बाद पत्नी और उनके नाबालिग बेटे ने CrPC की धारा 125 के तहत याचिका दायर की, जिसमें क्रमशः 20,000 रुपये और 10,000 रुपये के मासिक गुज़ारे-भत्ते की मांग की गई। फ़ैमिली कोर्ट ने नाबालिग बेटे को 5,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया, लेकिन पत्नी के दावे को इस आधार पर खारिज किया कि परमानेंट एलिमनी के लिए उनका पिछला दावा खारिज हो चुका था। इससे नाराज़ होकर याचिकाकर्ता हाईकोर्ट गईं।
यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता प्रतिवादी की आर्थिक स्थिति के बारे में सबूत पेश करने में नाकाम रहीं, जिससे 20,000 रुपये प्रति माह के उनके दावे की पुष्टि हो सके, कोर्ट ने कहा,
"प्रतिवादी के वकील की दलील के अनुसार, प्रतिवादी एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टेंट अकाउंटेंट के तौर पर काम कर रहे हैं और वे प्रति माह 29,000 रुपये कमाते हैं। इस तरह प्रतिवादी की आर्थिक स्थिति और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि विवादित आदेश के ज़रिए प्रतिवादी को याचिकाकर्ता नंबर 2 को गुज़ारे-भत्ते के तौर पर 5,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया गया, यह कोर्ट प्रतिवादी को याचिकाकर्ता नंबर 1 को भी गुज़ारे-भत्ते के तौर पर 5,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश देना उचित समझता है।"
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने प्रतिवादी को पत्नी और नाबालिग बेटे को गुज़ारे-भत्ते के तौर पर हर महीने 5,000 रुपये देने का निर्देश दिया।
Case: X & another vs Rajesh

