पत्नी के मानसिक विकार के बेबुनियाद दावे 'क्रूरता', ये अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित गरिमा पर प्रहार करते हैं: कर्नाटक हाईकोर्ट

  • पत्नी के मानसिक विकार के बेबुनियाद दावे क्रूरता, ये अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित गरिमा पर प्रहार करते हैं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी पर मानसिक विकार या मानसिक रूप से अनुपस्थित (Absent-Minded) होने के बेबुनियाद आरोप लगाना कानूनी रूप से 'क्रूरता' है। ऐसे दावे किसी व्यक्ति की मूल गरिमा और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार पर प्रहार करते हैं।

    जस्टिस अशोक एस. किनागी और जस्टिस सुब्रमण्य रंगा राव की खंडपीठ ने एक पति द्वारा दायर अपील खारिज की। पति ने क्रूरता और मानसिक विकार के आधार पर तलाक की मांग की थी। अदालत ने कहा कि किसी विशेषज्ञ चिकित्सा गवाह या इलाज करने वाले डॉक्टर से पूछताछ किए बिना, केवल अस्पताल के दस्तावेज पेश कर देना मानसिक बीमारी साबित करने के लिए काफी नहीं है।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    "मानसिक विकार या मानसिक रूप से अनुपस्थित होने के बेबुनियाद दावे कानूनी रूप से क्रूरता माने जाते हैं। ये किसी व्यक्ति की मूल गरिमा और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक, शांतिपूर्ण और प्रतिष्ठित जीवन जीने के अधिकार पर प्रहार करते हैं। एक सभ्य समाज में ऐसे आरोप किसी व्यक्ति के जीवन पर बहुत बुरा असर डाल सकते हैं।"

    खंडपीठ ने गौर किया कि पति ने न तो पत्नी के कथित मानसिक विकार या मानसिक रूप से अनुपस्थित होने के संबंध में कोई प्रमाण पत्र पेश किया, और न ही इलाज करने वाले डॉक्टर को गवाह के तौर पर बुलाया।

    अदालत ने कहा,

    "केवल दस्तावेज पेश कर देने या उन पर निशान लगा देने से यह नहीं माना जा सकता कि आरोप साबित हो गए। दूसरे शब्दों में, दस्तावेजों को पेश करने मात्र से ही साबित करने की जिम्मेदारी (Burden of Proof) खत्म नहीं हो जाती। चूंकि किसी विशेषज्ञ या डॉक्टर से पूछताछ नहीं की गई, इसलिए केवल इन दस्तावेजों के आधार पर याचिकाकर्ता का मामला साबित नहीं हो सकता।"

    अदालत ने आगे कहा,

    "जहां तक ​​अपीलकर्ता (पति) के इस आरोप का सवाल है कि प्रतिवादी (पत्नी) ने उसके साथ क्रूरता की है तो इसके समर्थन में कोई भी सबूत या सामग्री पेश नहीं की गई। अदालती दस्तावेजों में लगाए गए आरोपों को बिना जांचे-परखे सच नहीं माना जा सकता; उन्हें मौखिक और लिखित सबूतों के जरिए साबित करना होता है, जैसा कि कानून में तय प्रक्रिया है। अपना मामला साबित करने की पूरी जिम्मेदारी अपीलकर्ता (पति) पर है। चूंकि अपीलकर्ता अपना मामला साबित करने में विफल रहा है, इसलिए प्रतिवादी (पत्नी) से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किसी बात के 'न होने' (Negative) को साबित करे—कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।"

    कोई ठोस आधार न मिलने पर हाईकोर्ट ने अपील खारिज की।

    Case Title : V v/s S

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