'CrPC की धारा 313 के तहत सवाल आरोपी को उसकी समझ आने वाली भाषा में समझाए जाने चाहिए': झारखंड हाईकोर्ट

  • CrPC की धारा 313 के तहत सवाल आरोपी को उसकी समझ आने वाली भाषा में समझाए जाने चाहिए: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 313 के तहत आरोपी से उसकी समझ आने वाली भाषा में ही सवाल पूछे जाने चाहिए। अगर उसके बयान को गलत तरीके से दर्ज किया जाता है, जिससे उसे अपने खिलाफ मौजूद सबूतों या परिस्थितियों को स्पष्ट करने के अधिकार पर असर पड़ता है तो यह उसे बरी करने का आधार बन सकता है। कोर्ट ने एक अनपढ़ व्यक्ति की हत्या की सजा और उम्रकैद रद्द की। उसका बयान पूरी तरह से अंग्रेजी में दर्ज किया गया। इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि सवाल और जवाब उसे उसकी मातृभाषा में समझाए गए या नहीं।

    जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि CrPC की धारा 313 'ऑडी अल्टरम पार्टम' (Audi Alteram Partem - दूसरे पक्ष को भी सुनें) के सिद्धांत पर आधारित है। यह सुनिश्चित करती है कि किसी भी व्यक्ति को उसके खिलाफ सामने आई परिस्थितियों को स्पष्ट करने का मौका दिए बिना दोषी न ठहराया जाए।

    कोर्ट, रांची की 'एडिशनल ज्यूडिशियल कमिश्नर-XII-कम-फास्ट ट्रैक कोर्ट' के 25 अप्रैल 2018 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस फैसले में चमरा उरांव को IPC की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 20,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।

    अभियोजन पक्ष का आरोप था कि 26 फरवरी 2009 को आरोपी ने शिकायतकर्ता की पत्नी परमेश्वरी देवी को पकड़कर कुएं में छलांग लगा दी और उसे जबरदस्ती पानी के अंदर धकेल दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। शिकायतकर्ता ने भी उसे बचाने के लिए कुएं में छलांग लगाई, लेकिन वह उसे बचा नहीं सका। आरोप है कि आरोपी, जो शिकायतकर्ता का चाचा लगता है, ने जमीन को लेकर चल रहे विवाद के कारण यह हत्या की।

    ट्रायल की कार्यवाही की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि CrPC की धारा 313(1)(b) के तहत अदालतों की यह अनिवार्य जिम्मेदारी है कि वे आरोपी को अभियोजन पक्ष के सबूतों से सामने आने वाली हर उस परिस्थिति को स्पष्ट करने का मौका दें, जो उसके खिलाफ जाती हो।

    खंडपीठ ने कहा कि CrPC की धारा 313 का पालन करना केवल एक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत 'निष्पक्ष सुनवाई' (Fair Trial) के अधिकार का एक अहम हिस्सा है। इसमें आगे बताया गया कि जहाँ धारा 313(1)(a) अदालत को कार्यवाही के किसी भी चरण में आरोपी से सवाल पूछने की अनुमति देती है, वहीं धारा 313(1)(b) के तहत अभियोजन पक्ष के सबूत पेश होने के बाद और बचाव पक्ष के सबूत पेश होने से पहले आरोपी से पूछताछ करना अनिवार्य है।

    वर्तमान मामले पर आते हुए अदालत ने गौर किया कि आरोपी एक अनपढ़ ग्रामीण था, जिसने धारा 313 के तहत अपने बयान वाले दस्तावेज़ पर अपने बाएं अंगूठे का निशान (LTI) लगाया। हालांकि, सवालों और जवाबों सहित पूरा बयान अंग्रेज़ी में दर्ज किया गया। ऐसा कोई संकेत नहीं था कि सवालों का अनुवाद आरोपी की मातृभाषा में किया गया हो, या यह कि दर्ज किए गए जवाब उसे पढ़कर सुनाए गए हों और समझाए गए हों।

    अदालत ने माना कि जब किसी बयान का अनुवाद और उसे लिपिबद्ध (लिखा) ऐसी भाषा में किया जाता है जो आरोपी की अपनी भाषा नहीं है तो बयान दर्ज करने वाले व्यक्ति को यह प्रमाणित करना चाहिए कि बयान की बातें आरोपी को उसी भाषा में पढ़कर सुनाई और समझाई गईं, जिसमें उसने अपना बयान दिया था।

    अदालत ने टिप्पणी की:

    “…यह मुकदमे में एक गंभीर चूक है, जो मामले की जड़ तक जाती है। इस मामले में निष्पक्ष सुनवाई की नींव को ही हिला देती है। जिस व्यक्ति को अंग्रेज़ी पढ़ना, लिखना या समझना नहीं आता, उससे उस भाषा में कोई सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए। यदि भाषा को लेकर कोई संवादहीनता (Communication Gap) है या आरोपी भाषा नहीं समझ पा रहा है, तो उसे एक अनुवादक (Interpreter) उपलब्ध कराया जाना चाहिए…”

    खंडपीठ ने पाया कि अनुवाद या स्पष्टीकरण के बारे में कोई प्रमाणन न होने का मतलब यह है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आरोपी को अपने खिलाफ मौजूद उन परिस्थितियों के बारे में समझ आया, जिनके बारे में उससे सवाल पूछे गए। अदालत ने बयान दर्ज करने में एक और अनियमितता पर भी ध्यान दिया। हालांकि, आरोपी से पूछताछ 22 जुलाई 2016 को की गई, लेकिन उसके अंगूठे का निशान अगले दिन लिया गया।

    ट्रायल जज ने दर्ज किया कि पूछताछ के दिन बिजली न होने के कारण प्रिंटआउट नहीं निकाला जा सका। यह बयान 23 जुलाई 2016 को प्रिंट करके उस पर हस्ताक्षर किए गए। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया पर हैरानी जताई, खासकर इसलिए क्योंकि उस दस्तावेज़ पर ट्रायल जज के हस्ताक्षर भी थे, जिन पर 22 जुलाई 2016 की तारीख डली थी। कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी से पूछताछ के बाद उसे जाने दिया गया, और अगले दिन उसका अंगूठे का निशान लिया गया, जबकि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि उसे दस्तावेज़ में लिखी बातों के बारे में समझाया गया।

    बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि CrPC की धारा 313 के तहत की गई पूछताछ केवल औपचारिकता बनकर रह गई, जिससे आरोपी को गंभीर नुकसान पहुंचा।

    कोर्ट ने कहा:

    “इस प्रकार, हमारी राय है कि इस मामले में भारी अन्याय हुआ है। इसलिए हम मानते हैं कि इस मामले में CrPC की धारा 313 का पालन कानून के अनुसार नहीं किया गया, जिससे अपीलकर्ता को गंभीर नुकसान पहुँचा है।”

    महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच ने टिप्पणी की:

    “CrPC की धारा 313 के तहत बयान को गलत तरीके से दर्ज करना ही बरी करने का एक आधार है, क्योंकि इसका स्वाभाविक परिणाम यह होता है कि गवाहों के बयानों से आरोपी के खिलाफ जो बातें सामने आईं, उन्हें आरोपी के सामने स्पष्टीकरण के लिए नहीं रखा गया, बल्कि उसके खिलाफ ही इस्तेमाल कर लिया गया।”

    हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के सबूतों की भी स्वतंत्र रूप से जांच की और हत्या के आरोप में कई बड़ी कमियां पाईं। इन परिस्थितियों और CrPC की धारा 313 के तहत हुई गंभीर प्रक्रियात्मक चूक देखते हुए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।

    इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की, IPC की धारा 302 के तहत मिली सजा और आजीवन कारावास रद्द किया और अपीलकर्ता को 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) देते हुए बरी किया।

    Case Title : Chamra Oraon v. State of Jharkhand

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