PMLA कार्यवाही खत्म करने के लिए 'प्रेडिकेट ऑफ़ेंस' में बरी होने का फ़ैसला अंतिम होना चाहिए; अपील 'ब्लैंकेट शील्ड' नहीं हो सकती: झारखंड हाईकोर्ट
Shahadat
15 Sept 2026 7:04 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही खत्म करने से पहले 'प्रेडिकेट ऑफ़ेंस' (मुख्य अपराध) में बरी होने का फ़ैसला अंतिम होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जिस बरी होने के फ़ैसले को अपील में चुनौती दी जा सकती है, उसे प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (PMLA) के तहत कार्यवाही से बचने के लिए "ब्लैंकेट शील्ड" (सुरक्षा कवच) के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की सिंगल जज बेंच अमर मंडल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मंडल ने PMLA की धारा 3 और 4 के तहत डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफोर्समेंट (ED) द्वारा दर्ज एनफोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ECIR) को रद्द करने की मांग की।
यह ECIR कोयले के कथित अवैध परिवहन से जुड़े एक मामले से संबंधित थी। याचिकाकर्ता को गोड्डा के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने 10 फरवरी, 2026 को IPC की धारा 414 और 120B और माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 की धारा 4 और 21 के तहत 'प्रेडिकेट ऑफ़ेंस' (मुख्य अपराध) के आरोपों से बरी कर दिया। बरी होने के फ़ैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ PMLA की कोई कार्यवाही नहीं चल सकती, क्योंकि 'प्रेडिकेट ऑफ़ेंस' (जो 'शेड्यूल्ड ऑफ़ेंस' का आधार था) में उसे बरी कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि कानूनी स्थिति स्पष्ट है कि जब किसी व्यक्ति को 'शेड्यूल्ड ऑफ़ेंस' (अनुसूचित अपराध) के मामले में डिस्चार्ज, बरी या आपराधिक मामला रद्द करके "पूरी तरह से बरी" (Finally Absolved) कर दिया जाता है तो उस व्यक्ति के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। हालांकि, बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता के बरी होने का फ़ैसला अभी अंतिम नहीं हुआ, क्योंकि इसे सक्षम अपीलीय फोरम के सामने चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा:
"'पूरी तरह से बरी' होने की कानूनी स्थिति तब पक्की होती है, जब सभी उपलब्ध अपीलीय उपायों का पूरी तरह इस्तेमाल कर लिया जाए या फिर अपील दायर करने की कानूनी समय-सीमा बिना किसी चुनौती के खत्म हो जाए।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मजिस्ट्रेट का बरी करने का फ़ैसला केवल कोयले के कथित अवैध परिवहन तक ही सीमित है, जिसमें एक ही ट्रक पकड़ा गया। ट्रायल कोर्ट ने ₹85 लाख नकद, प्रॉपर्टी के 134 ओरिजिनल कागज़ात या याचिकाकर्ता के बैंक अकाउंट में जमा ₹8.94 करोड़ के कथित फॉरेंसिक ट्रेल की रिकवरी पर कोई फैसला नहीं सुनाया।
ज़ब्त की गई संपत्ति के बारे में ट्रायल कोर्ट द्वारा कोई फैसला न सुनाए जाने की वजह से कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता PMLA कार्यवाही के खिलाफ़ बचाव के तौर पर उस बरी होने के आदेश का सहारा नहीं ले सकता, जो अभी तक पूरी तरह से फाइनल नहीं हुआ।
बेंच ने यह भी नोट किया कि ज़ब्त की गई संपत्ति पहले से ही PMLA एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी, नई दिल्ली के सामने कार्यवाही का विषय थी। याचिकाकर्ता ने उन कार्यवाहियों में हिस्सा लिया और PMLA की धारा 8(1) के तहत जारी कारण बताओ नोटिस का विस्तृत जवाब दाखिल किया।
हाईकोर्ट ने ECIR रद्द करने से भी इनकार किया और कहा कि ECIR एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट का एक इंटरनल डॉक्यूमेंट है और यह FIR के बराबर नहीं है।
कोर्ट ने कहा:
“ECIR से आपराधिक मुकदमा शुरू नहीं होता; बल्कि, यह एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट का एक इंटरनल डॉक्यूमेंट है। अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए सिर्फ़ ECIR दर्ज करने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ़ मुकदमा शुरू किया जा रहा है। यह सिर्फ़ जांच की शुरुआत को दर्शाता है।”
बेंच ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शुरुआती स्तर पर ECIR में न्यायिक दखल नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब ज़ब्त की गई संपत्ति से जुड़ी ED की जांच और कानूनी कार्यवाही चल रही हो।
इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।
Case Title: Amar Mandal v. Directorate of Enforcement.


