CrPC की धारा 216 के तहत आरोप बदलने या जोड़ने की शक्ति केवल अदालत की, पक्षकारों के आवेदन से नहीं होती सीमित: झारखंड हाईकोर्ट

Praveen Mishra

1 July 2026 6:57 PM IST

  • CrPC की धारा 216 के तहत आरोप बदलने या जोड़ने की शक्ति केवल अदालत की, पक्षकारों के आवेदन से नहीं होती सीमित: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के तहत आरोप (Charge) में बदलाव या नया आरोप जोड़ने का अधिकार केवल ट्रायल कोर्ट के पास है। हालांकि, यदि अभियोजन या आरोपी इस संबंध में आवेदन देकर अदालत का ध्यान प्रासंगिक तथ्यों की ओर आकर्षित करते हैं, तो केवल इस वजह से अदालत की शक्ति सीमित नहीं हो जाती।

    जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गढ़वा द्वारा धारा 328 और 302/34 आईपीसी के तहत अतिरिक्त आरोप तय करने के आदेश को चुनौती दी गई थी।

    मामला सविता देवी की मौत से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, विवाह के बाद ससुराल पक्ष ने उसे प्रताड़ित किया और सत्तू में जहर मिलाकर जबरन पिलाया, जिससे उसकी मौत हो गई। हालांकि एफआईआर धारा 328 और 302/34 IPC के तहत दर्ज हुई थी, लेकिन जांच के बाद पुलिस ने केवल धारा 306 IPC के तहत आरोपपत्र दाखिल किया और 2017 में उसी धारा के तहत आरोप तय हुए।

    ट्रायल के दौरान गवाहों के बयान और एफएसएल रिपोर्ट में जहरीले पदार्थ की पुष्टि होने के बाद अभियोजन ने धारा 216 CrPC के तहत आवेदन देकर अतिरिक्त आरोप जोड़ने की मांग की, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 216 CrPC अदालत को निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोप में बदलाव या नया आरोप जोड़ने का अधिकार देती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत न तो अभियोजन और न ही आरोपी का कोई निहित अधिकार (Vested Right) है कि वे आरोप बदलने की मांग करें, लेकिन यदि किसी पक्ष के आवेदन से अदालत के संज्ञान में प्रासंगिक सामग्री आती है, तो उस पर विचार करने से अदालत की शक्ति प्रभावित नहीं होती।

    रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शी के बयान और एफएसएल रिपोर्ट को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से सामग्री का मूल्यांकन कर अतिरिक्त आरोप जोड़े थे। इसलिए आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई और आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।

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