झारखंड हाईकोर्ट ने ₹300 की रिश्वत वाले मामले में सज़ा कम की, कहा- आरोपी ने तीन दशकों तक 'मुक़दमे की पीड़ा' झेली

Shahadat

28 Aug 2026 10:26 AM IST

  • झारखंड हाईकोर्ट ने ₹300 की रिश्वत वाले मामले में सज़ा कम की, कहा- आरोपी ने तीन दशकों तक मुक़दमे की पीड़ा झेली

    झारखंड हाईकोर्ट ने 1993 के भ्रष्टाचार के मामले में एक व्यक्ति की सज़ा कम की। यह मामला शिकायतकर्ता के प्रोविडेंट फंड (PF) के पैसे की प्रोसेसिंग के लिए ₹300 की रिश्वत मांगने से जुड़ा था। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि आरोपी ने तीन दशकों तक "मुक़दमे की पीड़ा" झेली है।

    जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की सिंगल जज बेंच ने 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 के तहत सज़ा की अवधि पर विचार करते हुए कहा कि हालांकि इस प्रावधान में कम से कम छह महीने की सज़ा का नियम है, लेकिन अपीलकर्ता पहले ही एक महीने और एक दिन जेल में बिता चुका है। मामले की परिस्थितियों को देखते हुए उसे काफ़ी सज़ा मिल चुकी है।

    यह मामला इस आरोप से जुड़ा था कि अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता से उसके प्रोविडेंट फंड के पैसे की प्रोसेसिंग के लिए ₹300 की मांग की। यह घटना 1993 की है। बाद में अपीलकर्ता पर मुक़दमा चलाया गया और उसे 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' के तहत दोषी ठहराया गया।

    उसकी अपील पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने अपराध से जुड़ी परिस्थितियों और कार्यवाही में हुई लंबी देरी को देखते हुए सज़ा के सवाल पर अलग से विचार किया। सज़ा की अवधि के सवाल पर कोर्ट ने रिश्वत की मांग में शामिल अपेक्षाकृत छोटी रक़म, मुक़दमे में लगे लंबे समय और अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होने जैसी बातों पर ध्यान दिया।

    कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि अपीलकर्ता की प्रोविज़नल ज़मानत ₹5,000 जमा करने की शर्त पर मंज़ूर की गई, जो उसने जमा कर दि। कोर्ट ने दर्ज किया कि उसने कुल ₹7,000 का भुगतान किया। साथ ही एक महीने और एक दिन जेल में भी बिताया था।

    कोर्ट ने कहा:

    "यह घटना 1993 की है। अपीलकर्ता पहले ही तीन दशकों तक मुक़दमे की पीड़ा झेल चुका है और उसका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।"

    इन सभी परिस्थितियों पर एक साथ विचार करते हुए कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता को अपराध के लिए काफ़ी सज़ा मिल चुकी है। इसलिए हाईकोर्ट ने जेल की सज़ा को घटाकर उतनी ही कर दिया, जितनी अपीलकर्ता पहले ही काट चुका था, यानी एक महीने और एक दिन; साथ ही कोर्ट द्वारा तय किया गया जुर्माना भी भरना होगा।

    Case Title: Samir Kumar Choudhary v. State of Jharkhand through CBI

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