आपसी सहमति से तलाक की डिक्री को भी दी जा सकती है चुनौती: झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द किया
Praveen Mishra
26 Oct 2026 5:43 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से दिए गए तलाक के फैसले को आमतौर पर अपील के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती। हालांकि, अगर सहमति की वास्तविकता पर सवाल हो या कानून में तय जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया हो, तो ऐसी डिक्री के खिलाफ अपील की जा सकती है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने रांची फैमिली कोर्ट द्वारा 17 अगस्त 2024 को दिए गए आपसी सहमति से तलाक के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने शादी की तारीख को लेकर विवाद और पत्नी की सहमति स्वैच्छिक होने के सवाल की पर्याप्त जांच नहीं की थी।
हाईकोर्ट ने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, रांची के पास वापस भेज दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह अपील पत्नी ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले के खिलाफ फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 19(1) के तहत दायर की थी।
फैमिली कोर्ट में दाखिल संयुक्त तलाक याचिका के अनुसार, दोनों पक्षों की शादी 21 अप्रैल 2023 को हुई थी और वैवाहिक मतभेदों के कारण वे 1 जून 2023 से अलग रह रहे थे।
दोनों ने 12 जून 2024 को आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल की। मामला मध्यस्थता केंद्र भेजा गया, जहां दोनों पक्षों ने अलग होने की इच्छा जताई। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत तलाक की डिक्री पारित कर दी।
हालांकि, पत्नी ने हाईकोर्ट में दावा किया कि उनकी शादी 21 अप्रैल 2023 को नहीं, बल्कि 21 अप्रैल 2024 को हुई थी।
उसने तर्क दिया कि यदि शादी अप्रैल 2024 में हुई थी, तो जून 2024 में तलाक की संयुक्त याचिका दाखिल करते समय शादी को दो महीने भी पूरे नहीं हुए थे। ऐसे में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B(1) के तहत कम से कम एक साल अलग रहने की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं होती।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सबसे पहले हाईकोर्ट ने विचार किया कि आपसी सहमति से तलाक की डिक्री के खिलाफ अपील सुनवाई योग्य है या नहीं।
विभिन्न हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि सामान्य तौर पर आपसी सहमति से तलाक का फैसला दोनों पक्षों की स्वैच्छिक सहमति पर आधारित होता है। लेकिन जब सहमति की वास्तविकता पर ही सवाल उठाया जाए या कानूनी प्रक्रिया का पालन न हुआ हो, तो अदालत को मामले की जांच करनी जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह तलाक देने से पहले शादी की तारीख जैसे बुनियादी तथ्यों और दोनों पक्षों की सहमति की वास्तविकता की पुष्टि करे।
खंडपीठ ने कहा कि मध्यस्थता केंद्र में समझौता हो जाने का मतलब यह नहीं है कि फैमिली कोर्ट कानून की अनिवार्य शर्तों की जांच करना छोड़ दे।
पत्नी की सहमति स्वतंत्र और स्वैच्छिक होना जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पत्नी की सहमति स्वतंत्र, पूरी जानकारी के साथ और बिना किसी दबाव के दी गई थी। साथ ही, तलाक की डिक्री पारित किए जाने के समय भी उसकी सहमति बनी हुई थी या नहीं, इसकी पुष्टि जरूरी है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा दबाव में सहमति देने का आरोप लगा देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके साथ जबरदस्ती हुई थी। इस आरोप की भी उचित जांच और पुष्टि की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों की सुविधा या उनके बीच हुए कथित समझौते के आधार पर कानून की अनिवार्य शर्तों की अनदेखी करके तलाक की डिक्री को सही नहीं ठहराया जा सकता।
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द, नए सिरे से होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने पाया कि शादी की तारीख को लेकर महत्वपूर्ण विवाद और पत्नी की सहमति की स्वैच्छिक प्रकृति की पर्याप्त जांच नहीं की गई थी। इसलिए 17 अगस्त 2024 की तलाक की डिक्री को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया।

