जेल मैनुअल के नियम अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए होते हैं, इनका इस्तेमाल आपराधिक आरोप साबित करने के लिए नहीं किया जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट
Shahadat
26 Aug 2026 8:09 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जेल मैनुअल के तहत जेल अधिकारियों की तय जिम्मेदारियां अनुशासनात्मक कार्रवाई या कर्तव्य में लापरवाही के लिए तो अहम हो सकती हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल आपराधिक आरोप साबित करने के लिए नहीं किया जा सकता। आपराधिक आरोप तो दंड कानून के तहत अपराध के तत्वों के आधार पर ही तय किए जाने चाहिए।
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की सिंगल जज बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने लोहरदगा के डिविजनल जेल से विचाराधीन कैदी के भागने के मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 222 और धारा 120B के तहत जेल अधिकारी की सजा रद्द की।
यह अपील लोहरदगा के सेशन जज द्वारा अपीलकर्ता विद्या भूषण शर्मा को दोषी ठहराए जाने के खिलाफ थी। उन्हें IPC की धारा 222 के तहत पांच साल की कठोर कैद और ₹10,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई। IPC की धारा 120B के तहत कोई अलग सजा नहीं दी गई। सह-आरोपी गणेश मिश्रा को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, विचाराधीन कैदी उदय नाथ उरांव उर्फ उदय जी को नवंबर 2005 में बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल, होटवार, रांची से लोहरदगा के डिविजनल जेल लाया गया। 20 मई 2006 को शाम के समय कैदियों की गिनती के दौरान वह गायब मिला। उस समय अपीलकर्ता वार्डन के तौर पर ड्यूटी पर था। शुरू में भागे हुए कैदी के खिलाफ IPC की धारा 224 के तहत FIR दर्ज की गई। जांच के दौरान, IPC की धारा 120B और क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट की धारा 17(ii) भी जोड़ी गईं।
बाद में कैदी को ₹6 लाख नकद और हथियारों के साथ पकड़ा गया। पुलिस के सामने अपने कबूलनामे में उसने कथित तौर पर कहा कि वह किसी जेल अधिकारी की मदद के बिना खुद ही महिला वार्ड से भागने में कामयाब रहा था। जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और मामला ट्रायल के लिए आगे बढ़ा। ट्रायल कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता ने जानबूझकर विचाराधीन कैदी के साथ मिलीभगत करके उसके भागने में मदद की थी और उसे IPC की धारा 222 और धारा 120B के तहत दोषी ठहराया।
अपील में, हाई कोर्ट ने भागने की घटना से जुड़ी परिस्थितियों और ट्रायल कोर्ट द्वारा माने गए सबूतों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि कैदी के भागने का तरीका ही संदिग्ध था। कोर्ट ने देखा कि डॉग स्क्वाड पहले महिला वार्ड की ओर और उसके बाद मुख्य गेट की ओर गया। जांच अधिकारी ने भी माना था कि कैदी या तो महिला वार्ड से या मुख्य गेट से भाग सकता था।
कोर्ट ने यह भी देखा कि बिहारी यादव पहले गेट पर तैनात था और उसके पास मुख्य गेट की चाबियां थीं। हालांकि, जांच अधिकारी ने जेल अधिकारियों के आने-जाने का रिकॉर्ड रखने वाले संबंधित रजिस्टरों की जांच नहीं की थी ताकि यह पता लगाया जा सके कि वह उस समय वहां तैनात था या नहीं। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के एक गवाह की भूमिका को भी संदिग्ध पाया। भले ही उसकी गवाही मान ली जाए कि चाबी कुछ समय के लिए अपीलकर्ता को सौंपी गई, कोर्ट ने कहा कि इससे अपीलकर्ता का कैदी के भागने में मदद करने से कोई संबंध नहीं जुड़ता, खासकर तब जब दूसरे गेट की चाबी किसी दूसरे गार्ड के पास थी।
इसी के साथ बता दें, हाईकोर्ट ने आपराधिक आरोप को सही ठहराने के लिए जेल मैनुअल के तहत निर्धारित कर्तव्यों पर भरोसा करने के लिए ट्रायल कोर्ट की आलोचना की।
कोर्ट ने कहा:
“जेल मैनुअल के तहत तय की गई जिम्मेदारियां गलती करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई या कर्तव्य में लापरवाही के लिए तो महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल किसी खास अपराध के लिए आरोपी के खिलाफ आपराधिक आरोप साबित करने के लिए नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो अपराध के उन तत्वों के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए जो दंड कानून के तहत परिभाषित हैं।”
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट सभी सबूतों पर सही नजरिए से विचार करने में विफल रहा और अपीलकर्ता को दोषी ठहराते हुए जेल मैनुअल के प्रावधानों पर ही ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने माना कि दोषसिद्धि बाहरी तथ्यों पर आधारित थी और ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को "गलत, गैर-कानूनी, सबूतों के वजन से परे और रिकॉर्ड पर उपलब्ध महत्वपूर्ण सामग्री पर विचार न करने वाला" बताया।
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की और अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा रद्द की।
Case Title: Bidya Bhushan Sharma v. State of Jharkhand


