पिता का अपनी नाबालिग संतान को उसकी माँ की कस्टडी से ले जाना किडनैपिंग नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

Shahadat

29 July 2026 9:59 AM IST

  • पिता का अपनी नाबालिग संतान को उसकी माँ की कस्टडी से ले जाना किडनैपिंग नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पिता, जो अपनी नाबालिग संतान का स्वाभाविक संरक्षक (Natural Guardian) होता है, उस पर अपनी पत्नी की कस्टडी से अपने ही बेटे को ले जाने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 के तहत किडनैपिंग का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने माना कि जब आरोपी खुद बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक हो तो अपराध के ज़रूरी तत्व पूरे नहीं होते।

    जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच ने एक व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। उस व्यक्ति पर अपने चार साल के बेटे को किडनैप करने, जानबूझकर चोट पहुँचाने और गलत तरीके से रोकने (wrongful restraint) का आरोप है।

    याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। वह धनबाद के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करवाना चाहता था, जिसमें IPC की धारा 323, 341 और 363 के तहत दंडनीय अपराधों का संज्ञान लिया गया।

    शिकायत के अनुसार, याचिकाकर्ता की पत्नी अपने चार साल के बेटे के साथ धनबाद रेलवे स्टेशन गई, क्योंकि याचिकाकर्ता ने उन्हें बुलाया था। आरोप है कि याचिकाकर्ता बच्चे को ले गया और जब शिकायतकर्ता बाद में उसके घर गई तो याचिकाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों ने उसके साथ मारपीट की।

    मजिस्ट्रेट ने शिकायत, शिकायतकर्ता के शपथ-पत्र और जांच गवाहों के बयानों के आधार पर IPC की धारा 323, 341 और 363 के तहत प्रथम दृष्टया मामला पाया और समन जारी किया।

    हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बच्चे का पिता होने के नाते वह स्वाभाविक संरक्षक है। इसलिए किडनैपिंग का अपराध नहीं बनता। उसने आगे कहा कि शारीरिक पीड़ा का कोई आरोप नहीं है, जिससे IPC की धारा 323 लागू हो सके, और न ही गलत तरीके से रोकने का कोई आरोप है, जिससे IPC की धारा 341 के तहत अपराध बन सके।

    राज्य और शिकायतकर्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अगर आरोपों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया जाए तो प्रथम दृष्टया सभी अपराध बनते हैं। IPC की धारा 363 के तहत अपराध के ज़रूरी तत्वों की जांच करते हुए कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष को, अन्य बातों के अलावा, यह साबित करना होगा कि आरोपी ने नाबालिग को उसके कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना उनकी कस्टडी से दूर ले जाया था।

    इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

    “यह निर्विवाद तथ्य है कि याचिकाकर्ता, पीड़ित का पिता होने के नाते, पीड़ित का स्वाभाविक अभिभावक है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता का अपने ही बेटे को ले जाना IPC की धारा 363 के तहत दंडनीय अपराध मानने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

    कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायत में IPC की धारा 323 और 341 के तहत अपराधों के ज़रूरी तत्व नहीं बताए गए। कोर्ट ने देखा कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को कोई शारीरिक दर्द, बीमारी या कमजोरी पहुंचाई और “सिर्फ़ मारपीट का आरोप” IPC की धारा 323 के तहत जानबूझकर चोट पहुंचाने का अपराध मानने के लिए पर्याप्त नहीं है।

    इसी तरह बेंच ने गौर किया कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को किसी भी दिशा में जाने से रोका हो, जिस दिशा में जाने का उसे अधिकार है; इस प्रकार IPC की धारा 341 के तहत गलत तरीके से रोकने (wrongful restraint) का अपराध नहीं बनता।

    यह मानते हुए कि जिन अपराधों का संज्ञान लिया गया, उनमें से कोई भी अपराध नहीं बनता, भले ही आरोपों को सही मान लिया जाए, कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। तदनुसार, कोर्ट ने पूरी आपराधिक कार्यवाही और संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द किया।

    Case Title: Khalid Eqbal v. State of Jharkhand and Anr.

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