'रेप पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या विरोध के निशान न होना, उसकी बात पर अविश्वास करने का आधार नहीं': झारखंड हाईकोर्ट
Shahadat
7 Oct 2026 6:38 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या विरोध के निशान न होने को अकेले ही उसकी गवाही पर अविश्वास करने का आधार नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब पीड़िता नाबालिग हो और मेडिकल सबूत घटना की पुष्टि करते हों।
जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने उन अपीलकर्ताओं की अपील पर सुनवाई की, जिन्होंने IPC की धारा 376(D) और POCSO Act, 2012 की धारा 4, 8 और 12 के तहत अपनी सज़ा को चुनौती दी थी।
अपीलकर्ताओं को सिमडेगा के एडिशनल सेशन जज-I-कम-स्पेशल जज (POCSO) ने स्पेशल (POCSO) केस नंबर 10/2017 में दोषी ठहराया था और IPC की धारा 376(D) के तहत अपराध के लिए 20 साल की कठोर सज़ा और हर एक पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
अभियोजन पक्ष का मामला पीड़िता के बयान पर आधारित है, जो घटना के समय लगभग 16 साल की थी। वह सुरेश समद के घर एक कार्यक्रम में शामिल हुई थी और रात करीब 10:00 बजे हाथ-पैर धोने के लिए ट्यूबवेल के पास गई थी।
उसके बयान के अनुसार, अपीलकर्ताओं ने उसे पकड़ लिया, जिसके बाद एक आरोपी उसे ज़बरदस्ती खेत में ले गया और उसके साथ रेप किया। आरोप है कि हमले के दौरान दूसरे आरोपियों ने उसके हाथ-पैर पकड़ रखे थे। इसके बाद ग्रामीणों के आने के डर से आरोपी उसे ढोलीपहाड़ी ले गए, जहाँ उन्होंने फिर से उसके साथ रेप किया और घटना के बारे में किसी को न बताने की धमकी दी।
बाद में पीड़िता ने अपनी माँ को घटना के बारे में बताया, जिन्होंने पुलिस को सूचित किया। जलडेगा (बसजोर) पुलिस स्टेशन। IPC की धारा 376(2)(G) और POCSO Act की धारा 4 के तहत केस नंबर 22/2017 दर्ज किया गया। बाद में IPC की धारा 376(D) और POCSO Act की धाराओं 4, 8 और 12 के तहत आरोप तय किए गए।
हाईकोर्ट में अपील करने वालों ने मुख्य रूप से पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। तर्क दिया गया कि अभियोजन पक्ष का मामला काफी हद तक पीड़िता के अकेले बयान पर आधारित है और मेडिकल जांच में विरोध या संघर्ष का कोई निशान नहीं मिला, जिससे बचाव पक्ष के अनुसार, गैंग रेप का आरोप संदिग्ध लगता है। बचाव पक्ष ने अपील करने वालों और पीड़िता के परिवार के बीच कथित पुरानी दुश्मनी का भी हवाला दिया, जो उन्हें झूठे मामले में फंसाने का एक संभावित कारण हो सकता है।
राज्य ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता का बयान भरोसेमंद था और मेडिकल सबूतों से इसकी पुष्टि होती थी। साथ ही यह भी कहा गया कि चोट या संघर्ष के निशानों का न होना, अपने आप में पीड़िता के बयान को अविश्वसनीय नहीं बनाता।
सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट को पीड़िता के बयान पर अविश्वास करने का कोई आधार नहीं मिला। कोर्ट ने संघर्ष के निशान न होने के आधार पर दिए गए तर्क को विशेष रूप से खारिज किया।
कोर्ट ने कहा:
“पीड़िता के बयान का मूल्यांकन करने के बाद हमें उसके बयान पर अविश्वास करने का कोई आधार नहीं मिला। केवल संघर्ष का निशान न होना पीड़िता के बयान पर अविश्वास करने का आधार नहीं हो सकता। हमें पीड़िता की उम्र पर भी ध्यान देना होगा, जो 16 साल है और जिस पर तीन आरोपियों ने काबू पा लिया था। मेडिकल सबूत तुरंत हुए यौन हमले की पुष्टि करते हैं।”
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पीड़िता की मां का बयान PW-1 के तौर पर दर्ज किया गया और उनके बयान ने घटना और उसके बाद उन्हें दी गई जानकारी के बारे में पीड़िता के बयान की पुष्टि की।
कोर्ट ने माना कि भले ही अन्य गवाह चश्मदीद नहीं थे, लेकिन पीड़िता का बयान भरोसेमंद था और मेडिकल रिपोर्ट से उसे समर्थन मिल रहा था। पक्षों के बीच कथित दुश्मनी भी उसके बयान पर अविश्वास करने का आधार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं थी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ने सभी अपीलकर्ताओं का अपराध बिना किसी उचित संदेह के साबित कर दिया था और ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया था।
इसके अनुसार, अपील खारिज कर दी गई और IPC की धारा 376(D) तथा POCSO एक्ट की धाराओं 4, 8 और 12 के तहत अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
Case Title : Mukesh Bilung and Ors v. State of Jharkhand

