बिना क्रॉस एक्जामिनेशन के प्रारंभिक जांच के सबूत विभागीय निष्कर्षों का आधार नहीं बन सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Shahadat

31 March 2026 5:50 PM IST

  • बिना क्रॉस एक्जामिनेशन के प्रारंभिक जांच के सबूत विभागीय निष्कर्षों का आधार नहीं बन सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर हाउसिंग बोर्ड के कर्मचारी के खिलाफ पारित बर्खास्तगी आदेश रद्द किया। कोर्ट ने माना कि अनुशासनात्मक कार्यवाही दोषपूर्ण थी, क्योंकि जांच अधिकारी ने प्रारंभिक जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों पर भरोसा किया, जबकि दोषी कर्मचारी को गवाहों से जिरह करने का अवसर नहीं दिया गया।

    कोर्ट ने दोहराया कि प्रारंभिक जांच से मिले सबूतों का इस्तेमाल नियमित विभागीय जांच में नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

    कोर्ट एक कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसे श्रीनगर के हाउसिंग कॉलोनी बागी-मेहताब और श्रीनगर के हाउसिंग कॉलोनी सनत नगर में स्थित ज़मीन के दो भूखंडों से संबंधित कथित अनियमितताओं के मामले में उसके खिलाफ की गई दो विभागीय जांचों के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। ये जांचें कश्मीर के संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) के समक्ष दर्ज शिकायतों के आधार पर शुरू की गई थीं, जिनमें प्रवासी संपत्ति की अवैध बिक्री और भू-माफिया की संलिप्तता का आरोप लगाया गया।

    जस्टिस जावेद इकबाल वानी की पीठ ने टिप्पणी की:

    "यह स्पष्ट है कि प्रारंभिक जांच में दर्ज किए गए सबूतों का इस्तेमाल नियमित जांच में नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोषी व्यक्ति उस जांच से जुड़ा हुआ नहीं होता। ऐसी जांच में जिन लोगों से पूछताछ की जाती है, उनसे क्रॉस एक्जामिनेशन करने का अवसर नहीं दिया जाता। ऐसे सबूतों का इस्तेमाल करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।"

    याचिकाकर्ता जम्मू और कश्मीर हाउसिंग बोर्ड में 'खिलाफवर्ज़ी इंस्पेक्टर' (उल्लंघन निरीक्षक) के पद पर कार्यरत था। कश्मीर के संभागीय आयुक्त के समक्ष प्रवासी संपत्ति की अवैध बिक्री के संबंध में कुछ शिकायतें दर्ज की गईं, यह संपत्ति श्रीनगर के हाउसिंग कॉलोनी बागी-मेहताब में स्थित भूखंड संख्या 57 थी।

    संभागीय आयुक्त ने एक जांच अधिकारी नियुक्त किया, जिसे इस भूखंड की बिक्री, 'पावर ऑफ अटॉर्नी' (मुख्तारनामा) के निष्पादन तथा श्रीनगर के सरकारी हाउसिंग कॉलोनी, सनत नगर में स्थित भूखंड संख्या 170 के संबंध में प्रारंभिक जांच करने का जिम्मा सौंपा गया। इस जांच में भू-माफिया और बोर्ड के अधिकारियों की संलिप्तता—जिसमें याचिकाकर्ता की भूमिका भी शामिल थी—की जांच करना भी शामिल था।

    प्रारंभिक जांच के दौरान, जांच अधिकारी ने बोर्ड से संबंधित रिकॉर्ड एकत्र किए और भूखंड संख्या 57 के मूल आवंटन-धारक (Allottee) से संपर्क किया। आवंटन-धारक ने इस बात से इनकार किया कि उसने किसी भी व्यक्ति के पक्ष में कोई 'पावर ऑफ अटॉर्नी' निष्पादित (हस्ताक्षरित) की थी। जांच अधिकारी ने विभिन्न व्यक्तियों के बयान दर्ज किए, जिनमें कथित 'पावर ऑफ अटॉर्नी' धारक भी शामिल था; उसने अपने बयान में कहा कि उसने लगभग इतने रुपये जमा किए।

    इस लेन-देन के संबंध में याचिकाकर्ता और उसके बेटे के बैंक खाते में 16,00,000/- रुपये जमा हुए। जांच अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता पहली नज़र में उस प्लॉट से संबंधित लेन-देन करने की कोशिश में शामिल था, और दस्तावेज़ों को तैयार करने तथा उनका इस्तेमाल करने में उसने एक मध्यस्थ (Facilitator) की भूमिका निभाई थी। इसलिए अधिकारी ने यह सिफ़ारिश की कि इस मामले को गहन जांच के लिए क्राइम ब्रांच को सौंप दिया जाए।

    इस प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर 18 जनवरी, 2021 को याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया और उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई। याचिकाकर्ता को एक आरोप-पत्र (Charge Sheet) सौंपा गया, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि उसने प्लॉट संख्या 57 के संबंध में अपने पद का दुरुपयोग किया, कथित अटॉर्नी धारक के साथ वित्तीय लेन-देन किया तथा कदाचार करते हुए अपने आधिकारिक पद का गलत इस्तेमाल किया।

    इसके बाद एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध लगाए गए आरोप पूरी तरह से सिद्ध हो चुके हैं। प्लॉट संख्या 170 के संबंध में याचिकाकर्ता को एक और आरोप-पत्र सौंपा गया। इस मामले में एक अलग जांच की गई; इस जांच के अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने 'जम्मू और कश्मीर सरकारी कर्मचारी आचरण नियम, 1971' (Jammu & Kashmir Government Employees Conduct Rules, 1971) का उल्लंघन किया।

    इन दोनों जांचों की रिपोर्टों के आधार पर याचिकाकर्ता को एक 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) जारी किया गया। इसके परिणामस्वरूप, उसे सेवा से बर्खास्त करने का विवादित आदेश पारित कर दिया गया।

    न्यायालय की टिप्पणी:

    न्यायालय ने एक 'प्रारंभिक जांच' और 'नियमित विभागीय जांच' के बीच के अंतर का विश्लेषण किया। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय—'स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश बनाम राम प्रकाश सिंह, 2025 SCC OnLine SC 891'—का हवाला दिया। न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि प्रारंभिक जांच आयोजित करने का एकमात्र उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि क्या किसी दोषी कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त सामग्री (सबूत) उपलब्ध है। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी प्रारंभिक जांच में दर्ज किए गए निष्कर्षों को तब तक 'सबूत' नहीं माना जा सकता, जब तक कि उन निष्कर्षों से संबंधित साक्ष्य को नियमित विभागीय जांच के दौरान प्रस्तुत न किया जाए और उन पर 'प्रति-परीक्षण' (Cross-Examination) न कर लिया जाए।

    अदालत ने पाया कि पार्टियों द्वारा रिकॉर्ड पर लाए गए जिन दस्तावेज़ों पर जांच के दौरान विचार किया जाना चाहिए, उनका मतलब केवल ऐसे दस्तावेज़ों से है जिन्हें कानून द्वारा मान्य तरीके से रिकॉर्ड पर लाया गया हो। हालांकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 विभागीय जांचों पर सख्ती से लागू नहीं होता है। फिर भी उससे निकलने वाले सिद्धांतों को विशिष्ट मामलों में लागू किया जा सकता है; गवाहों द्वारा दिए गए साक्ष्य को दोषी कर्मचारी की उपस्थिति में रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और उसे गवाहों से जिरह करने का अवसर दिया जाना चाहिए, अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया।

    अदालत ने राय दी,

    “यदि किसी दोषी अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच में किसी दस्तावेज़ी साक्ष्य पर भरोसा किया जाता है, तो न केवल उस दस्तावेज़ी साक्ष्य की सामग्री को, उस सामग्री की जानकारी रखने वाले किसी गवाह की जाँच करके साबित किया जाना चाहिए, बल्कि दोषी कर्मचारी को भी ऐसे गवाह से जिरह करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।”

    निर्मला जे. झाला बनाम गुजरात राज्य, (2013) 4 SCC 301 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने पाया कि अमलेंदु घोष बनाम उत्तर पूर्वी रेलवे मामले में संविधान पीठ ने यह माना था कि प्रारंभिक जांच का उद्देश्य केवल किसी विशेष तथ्य का पता लगाना और प्रथम दृष्टया यह जानना है कि क्या कथित कदाचार किया गया। प्रारंभिक जांच में दर्ज निष्कर्षों के आधार पर दंड का कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

    इन सिद्धांतों को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए अदालत ने जांच के रिकॉर्ड की जाँच की और पाया कि जांच रिपोर्टों में गवाहों के कई बयानों पर भरोसा किया गया, जिनके संबंध में याचिकाकर्ता को गवाहों से क्रॉस एक्जामिनेशन करने का अवसर नहीं दिया गया।

    अदालत ने पाया कि इन बयानों की जांच याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रारंभिक जांच के दौरान की गई और नियमित विभागीय जाँच में इन पर भरोसा किया गया, जबकि याचिकाकर्ता को जिरह के माध्यम से इनका खंडन करने का अवसर प्रदान नहीं किया गया।

    अदालत ने आगे पाया कि प्लॉट संख्या 57 से संबंधित जाँच के मामले में भी, हालांकि जांच अधिकारी ने यह राय दी थी कि कथित जाली पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार करने में याचिकाकर्ता की संलिप्तता दर्शाने वाला कोई साक्ष्य नहीं है। फिर भी जांच अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ सभी आरोप संदेह से परे साबित हो गए।

    अदालत ने पाया कि ऐसा निष्कर्ष प्रथम दृष्टया असंगत था, जिससे जांच के संचालन के तरीके और ढंग के बारे में गंभीर संदेह उत्पन्न होते हैं। अदालत ने माना कि विभागीय कार्यवाही से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है। अदालत ऐसी कार्यवाहियों के संबंध में अपील के तौर पर सुनवाई नहीं करेगी।

    हालांकि, परवीन कुमार बनाम भारत संघ, 2020 (9) SCC 471 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जहां निर्णय लेने की प्रक्रिया ही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन, या मनमानी, या कानूनी साक्ष्यों की अनुपलब्धता के कारण दूषित हो, वहां अदालत का हस्तक्षेप करना उचित होगा।

    यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही में गंभीर कानूनी खामियां थीं, अदालत ने रिट याचिका स्वीकार कर ली और बर्खास्तगी का विवादित आदेश रद्द कर दिया।

    Case Title: Petitioner Vs Union Territory of J&K & Ors.

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