CAPF भर्ती में मेडिकल बोर्ड की राय आखिरी, कोर्ट गलत इरादे या प्रोसेस में कमी के अलावा अपील नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Shahadat

19 Feb 2026 8:45 PM IST

  • CAPF भर्ती में मेडिकल बोर्ड की राय आखिरी, कोर्ट गलत इरादे या प्रोसेस में कमी के अलावा अपील नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (CAPFs) की भर्ती के मामलों में कोर्ट के दखल की सीमित गुंजाइश पर ज़ोर देते हुए जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड का फैसला आखिरी है और प्रोसेस में गलती या गलत इरादे जैसी खास स्थितियों को छोड़कर कोर्ट द्वारा आगे रिव्यू या दोबारा जांच नहीं की जा सकती।

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि CAPFs की भर्ती को कंट्रोल करने वाला कानूनी ढांचा दूसरी मेडिकल जांच के बाद दी गई मेडिकल राय को आखिरी दर्जा देता है। कोर्ट को ऐसे एक्सपर्ट फैसलों को बदलने में धीमा होना चाहिए।

    यह बात जस्टिस संजय धर ने यूनिस अली नाम के एक व्यक्ति की रिट पिटीशन खारिज करते हुए कही, जिसने CAPFs में कांस्टेबल (GD) के तौर पर नियुक्ति के लिए अपनी मेडिकल फिटनेस की फिर से जांच करने के लिए एक नया, स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड बनाने की मांग की। यह मामला स्टाफ सिलेक्शन कमीशन के ऐड नोटिफिकेशन से शुरू हुआ, जिसमें CAPFs, SSF में कांस्टेबल (GD) और असम राइफल्स में राइफलमैन (GD) के पदों पर भर्ती की बात थी। याचिकाकर्ता ने नोटिफिकेशन के मुताबिक अप्लाई किया, फिजिकल स्टैंडर्ड टेस्ट (PST), फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट (PET) और डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में कामयाबी से पास हुआ। उसके बाद डिटेल्ड मेडिकल एग्जामिनेशन (DME) के लिए बैठा।

    DME के ​​दौरान, याचिकाकर्ता को मायोपिया, स्क्विंट और नॉक नी की वजह से मेडिकली अनफिट घोषित किया गया। भर्ती नियमों के तहत दिए गए उपाय का फायदा उठाते हुए उसने रिव्यू मेडिकल एग्जामिनेशन करवाया। रिव्यू मेडिकल बोर्ड ने उसे मायोपिया और नॉक नी से तो ठीक कर दिया, लेकिन उसकी दाहिनी आंख में स्क्विंट पाया और उसे फिर से अनफिट घोषित कर दिया।

    इससे परेशान होकर याचिकाकर्ता ने जम्मू के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के ऑप्थल्मोलॉजी डिपार्टमेंट के जारी आउटपेशेंट कार्ड पर भरोसा किया, जिसमें यह दर्ज था कि स्क्विंट का कोई सबूत नहीं है। साथ ही एक इंडिपेंडेंट बोर्ड से नए सिरे से रिव्यू की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एडवोकेट पी. एन. भट ने कहा कि CAPF अधिकारियों द्वारा किया गया मेडिकल एग्जामिनेशन कैजुअल और गलत था। गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के स्पेशलिस्ट की राय से यह साफ पता चलता है कि याचिकाकर्ता को स्क्विंट की समस्या नहीं थी। यह कहा गया कि गलत मेडिकल राय के आधार पर उसका कैंडिडेट रिजेक्ट करना मनमाना और गैर-कानूनी था।

    याचिका का विरोध करते हुए प्रतिवादी के वकील विशाल शर्मा, DSGI ने एडवोकेट सुमंत सूदन की मदद से कहा कि लागू मेडिकल पॉलिसी के तहत तीसरे मेडिकल एग्जामिनेशन का कोई प्रोविज़न नहीं है। 24 अगस्त, 2005 के मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स के मेमोरेंडम पर भरोसा किया गया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती।

    पक्षकारों को सुनने और रिकॉर्ड की जांच करने के बाद कोर्ट ने मुख्य मुद्दा यह तय किया कि क्या किसी सरकारी हॉस्पिटल द्वारा जारी आउटपेशेंट कार्ड में डॉक्टर द्वारा दर्ज की गई राय, रिक्रूटमेंट रूल्स के तहत बनाए गए रिव्यू मेडिकल बोर्ड के नतीजों को ओवरराइड या डिसक्रेडिट कर सकती है।

    इस मुद्दे का जवाब देते हुए कोर्ट ने लगातार न्यायिक मिसाल का ज़िक्र किया, जिसमें विवेक कुमार बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी और दिवाकर पासवान बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले शामिल हैं, जो कोर्ट को सिर्फ़ कैंडिडेट से मिली बाद की या उलटी मेडिकल राय के आधार पर एक्सपर्ट बोर्ड द्वारा किए गए मेडिकल असेसमेंट को फिर से खोलने के खिलाफ़ चेतावनी देते हैं।

    कोर्ट ने कहा,

    “कानूनी नियमों के तहत बने मेडिकल बोर्ड द्वारा फिटनेस के असेसमेंट से जुड़े मामलों में दखल देने का दायरा... बहुत कम होगा।”

    साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि मेडिकल फिटनेस ऐसा विषय है, जिसे एक्सपर्ट्स पर छोड़ देना चाहिए और कोर्ट इसका तुलनात्मक मूल्यांकन नहीं कर सकते।

    जस्टिस धर ने कहा कि सिर्फ़ हर व्यक्ति की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर मेडिकल जांच फिर से शुरू करने की इजाज़त देने से खतरनाक मिसाल कायम होगी और कानूनी नियमों के हिसाब से सख्ती से की जाने वाली भर्ती प्रक्रिया पटरी से उतर जाएगी।

    कोर्ट ने कहा,

    “आम तौर पर CAPFs के सिलेक्शन प्रोसेस में रिव्यू मेडिकल बोर्ड का फ़ैसला आखिरी होता है। कोर्ट इसे प्रोसेस के उल्लंघन या गलत इरादे जैसी खास स्थितियों को छोड़कर आगे रिव्यू या दोबारा जांच के लिए नहीं रख सकते।”

    बेंच ने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि गृह मंत्रालय ने 24 अगस्त, 2005 के अपने मेमोरेंडम के ज़रिए साफ़ तौर पर दोहराया कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं की जा सकती। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक बार तय प्रोसीजर के हिसाब से मेडिकल बोर्ड की राय बन जाने के बाद वह पक्की हो जाती है। उसमें हल्के में दखल नहीं दिया जा सकता।

    कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा,

    “CAPFs भर्ती में मेडिकल जांच का कानूनी ढांचा साफ तौर पर यह बताता है कि मेडिकल बोर्ड का असेसमेंट आखिरी होता है। दूसरी मेडिकल जांच के नतीजों के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती।”

    इन सिद्धांतों को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि GMC जम्मू के ऑप्थल्मोलॉजी डिपार्टमेंट के रजिस्ट्रार द्वारा आउटपेशेंट कार्ड पर की गई अकेली एंट्री, तीन स्पेशलिस्ट डॉक्टरों वाले रिव्यू मेडिकल बोर्ड की मिली-जुली राय को खारिज करने के लिए काफी नहीं थी। यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता ने न तो किसी प्रोसीजर में गड़बड़ी का आरोप लगाया और न ही उसे साबित किया।

    कोर्ट ने कहा,

    “रिव्यू मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर शक पैदा करने वाले किसी भी ठोस सबूत के न होने पर इस कोर्ट के लिए उसके नतीजों का ज्यूडिशियल रिव्यू करने की शायद ही कोई गुंजाइश है।”

    याचिका में कोई दम न पाते हुए हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया।

    Case Title: Younis Ali Vs Union Of India & Ors

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