अतीत के आधार पर अनवरत कैद उचित नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट ने पूर्व हिजबुल मुजाहिद्दीन सदस्य को दी जमानत

Amir Ahmad

18 Feb 2026 12:48 PM IST

  • अतीत के आधार पर अनवरत कैद उचित नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट ने पूर्व हिजबुल मुजाहिद्दीन सदस्य को दी जमानत

    जम्मू कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के संवैधानिक अधिकार को पुनः रेखांकित करते हुए कहा कि किसी आरोपी के पूर्व आचरण के आधार पर जिसके लिए वह पहले ही अभियोजन और हिरासत झेल चुका हो उसे वर्तमान मामले में अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, जब तक उसके खिलाफ विश्वसनीय और प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हों।

    जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए अब्दुल राशिद की जमानत अपील स्वीकार की और NIA कोर्ट जम्मू द्वारा पारित जमानत अस्वीकृति आदेश निरस्त किया।

    पीठ ने कहा,

    “अपीलकर्ता का पूर्व आचरण जिसके लिए वह पहले ही अभियोजन और हिरासत का सामना कर चुका है, अपने आप में वर्तमान FIR में लगाए गए आरोपों से उसे जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

    पूरा मामला

    मामले की शुरुआत वर्ष 2010 में दर्ज FIR से हुई। प्रारंभ में रणबीर दंड संहिता की धारा 420, 406 और 109 के तहत मामला दर्ज किया गया। आरोप था कि एक सिम कार्ड का दुरुपयोग कर डोडा जिले के ठेकेदारों और प्रभावशाली व्यक्तियों से जबरन वसूली के कॉल किए गए।

    करीब बारह वर्ष बाद वर्ष 2022 में जांच पूरी कर आरोप-पत्र दाखिल किया गया, जिसमें गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) की कठोर धाराएं 13, 18, 18-बी, 20 और 38 जोड़ी गईं।

    अब्दुल राशिद जिसे अभियोजन ने आत्मसमर्पण कर चुका पूर्व हिजबुल मुजाहिद्दीन सदस्य बतायापहले भी विभिन्न आपराधिक मामलों और लोक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में रह चुका था।

    हालांकि वे मामले या तो न्यायिक जांच में टिक नहीं पाए या उसमें वह बरी हो गया। इसके बावजूद वर्ष 2022 में उसे पुनः गिरफ्तार किया गया और वह तब से निरंतर हिरासत में था।

    अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

    हाइकोर्ट ने पाया कि यदि वर्ष 2010 में ही आरोप आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े थे तो उस समय गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम नहीं लगाया जाना गंभीर संदेह उत्पन्न करता है। एक दशक बाद कठोर धाराएं जोड़ना अभियोजन की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करता है।

    पीठ ने यह भी गौर किया कि एक जांच अधिकारी ने प्रारंभ में आरोपी के विरुद्ध कोई मामला न बनने की राय दी थी। वर्षों बाद बिना किसी नए और ठोस साक्ष्य के जांच को पुनर्जीवित करना अभियोजन की कहानी को कमजोर करता है।

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कथित सिम कार्ड या मोबाइल फोन की कोई बरामदगी नहीं हुई, जो पूरे मामले की बुनियाद था। संरक्षित गवाहों के बयान भी लगभग दस वर्ष बाद सामने आए जिसे अदालत ने गंभीर कमी माना।

    पीठ ने कहा कि कठोर वैधानिक प्रावधानों के बावजूद संवैधानिक न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हट सकते। यदि मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है तो लंबे समय तक हिरासत पूर्व-दंड के समान हो सकती है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह प्रतीत हो कि आत्मसमर्पण के बाद आरोपी किसी आतंकवादी या गैरकानूनी गतिविधि में संलिप्त रहा हो।

    इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को सख्त शर्तों के साथ जमानत देने का आदेश दिया। उसे नियमित रूप से ट्रायल कोर्ट में उपस्थित रहना होगा गवाहों को प्रभावित नहीं करना होगा तथा सार्वजनिक व्यवस्था के प्रतिकूल किसी गतिविधि में संलिप्त नहीं होना होगा।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत तक सीमित हैं और ट्रायल के अंतिम निर्णय पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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