जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत पिछली तारीख से नियमितीकरण नहीं: हाइकोर्ट
Amir Ahmad
12 Jan 2026 1:11 PM IST

जम्मू–कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने सेवा मामलों में बार-बार उठने वाले एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि केवल निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर लेने मात्र से किसी कर्मचारी को पिछली तारीख से नियमितीकरण का अधिकार नहीं मिल जाता। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जम्मू एंड कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2010 के तहत नियमितीकरण केवल भविष्य प्रभाव से ही किया जा सकता है, भले ही कर्मचारी ने निर्धारित योग्यता अवधि पहले ही पूरी कर ली हो।
जस्टिस संजय धर ने जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (JKPDC) के चार इंजीनियरों द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उनकी सेवाओं का नियमितीकरण या तो दो वर्ष की सेवा पूरी होने की तारीख से किया जाए, अथवा वैकल्पिक रूप से सात वर्ष की निरंतर सेवा पूर्ण करने की तारीख से।
याचिका खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने कहा,
“याचिकाकर्ता न तो दो वर्ष की सेवा पूरी होने पर और न ही ठीक सात वर्ष की सेवा पूरी होने पर नियमितीकरण के हकदार हैं। वे केवल उसी तारीख से नियमितीकरण के पात्र हैं, जिस तारीख को संबंधित प्राधिकरण द्वारा इसकी स्वीकृति दी गई।”
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं को जून, 2005 में पहलगाम माइक्रो हाइडल परियोजना में शिफ्ट इंजीनियर के रूप में समेकित वेतन पर नियुक्त किया गया। उनकी सेवाएं समय-समय पर बढ़ाई जाती रहीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निगम की नीति के अनुसार दो वर्ष की संतोषजनक सेवा के बाद नियमितीकरण किया जाना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह लाभ नहीं दिया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी कई प्रस्तुतियां वर्षों तक लंबित रहीं, जबकि उनसे बाद में नियुक्त कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया। वर्ष 2013 में पहली बार उनके नाम एक सूची में शामिल किए गए, जिसमें यह दर्शाया गया कि वे वर्ष 2012 तक सात वर्ष की सेवा पूरी कर चुके हैं। अंततः वर्ष 2017 में उनके सेवाकाल को नियमित किया गया, लेकिन केवल भविष्य प्रभाव से।
पिछली तारीख से नियमितीकरण न दिए जाने से आहत होकर उन्होंने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इसे समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया।
हाइकोर्ट के अवलोकन
हाइकोर्ट ने सबसे पहले दो वर्ष की सेवा के आधार पर नियमितीकरण की मांग पर विचार किया। हाइकोर्ट ने पाया कि जिन कर्मचारियों का उदाहरण याचिकाकर्ताओं ने दिया, वे वर्ष 2003 के संविदात्मक नियुक्ति नियमों के तहत चयन प्रक्रिया के बाद नियुक्त किए गए। जबकि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति किसी चयन प्रक्रिया के माध्यम से नहीं हुई। इसलिए वह नीति उनके मामले में लागू नहीं हो सकती।
इसके बाद हाइकोर्ट ने 2010 अधिनियम के तहत नियमितीकरण की प्रभावी तारीख के प्रश्न पर विचार किया। हाइकोर्ट ने अधिनियम की धारा 5 का विश्लेषण करते हुए कहा कि इसका पहला उपबंध स्पष्ट रूप से यह बताता है कि नियमितीकरण केवल उसी तारीख से प्रभावी होगा, जिस तारीख को नियमितीकरण आदेश जारी किया जाए, भले ही कर्मचारी सात वर्ष से अधिक सेवा कर चुका हो।
जस्टिस धर ने कहा,
“कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि कोई अस्थायी या संविदात्मक कर्मचारी सात वर्ष की सेवा पूरी करते ही उसी दिन नियमित कर दिया जाएगा।”
हाइकोर्ट ने इस विषय पर पूर्व में दिए गए विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि समान पीठों के निर्णयों में मतभेद हो तो उस निर्णय का अनुसरण किया जाना चाहिए, जो कानून की अधिक तार्किक और स्पष्ट व्याख्या करता हो। इस आधार पर हाइकोर्ट ने अब्दुल मजीद मगराय मामले में दिए गए निर्णय को अपनाया, जिसमें पिछली तारीख से नियमितीकरण को स्पष्ट रूप से नकारा गया था।
निष्कर्ष
सभी तथ्यों, कानून और पूर्व निर्णयों पर विचार करने के बाद हाइकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता न तो दो वर्ष की सेवा पूरी होने पर और न ही सात वर्ष की सेवा पूरी होते ही नियमितीकरण के पात्र हैं। वर्ष 2017 में दिया गया नियमितीकरण आदेश वैध है और उससे पहले की किसी तारीख से कोई लाभ नहीं दिया जा सकता।
इसी के साथ याचिका निराधार बताते हुए खारिज कर दी गई और सभी अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए गए।

