गैर-जमानती मामलों में आरोपी महिलाएं अलग श्रेणी; CrPC की धारा 437 की कठोरता से बंधे नहीं रह सकते न्यायालय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
Amir Ahmad
1 Jan 2026 3:42 PM IST

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह दोहराया कि गैर-जमानती अपराधों में आरोपी महिलाएं एक विशिष्ट श्रेणी बनाती हैं और उनकी जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय न्यायालयों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437 की कठोरता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अदालत ने हत्या के एक मामले में तीन महिला विचाराधीन बंदियों को जमानत देते हुए कहा कि CrPC की धारा 437(1) का प्रावधान मात्र औपचारिक नहीं बल्कि मानवीय विधायी मंशा को दर्शाता है, जिसे न्यायिक विवेक में वास्तविक रूप से लागू किया जाना चाहिए।
जस्टिस राहुल भारती की पीठ ने सलीमा बानो, रेशमा और रुबीना की जमानत याचिकाएं स्वीकार कीं। ये तीनों महिलाएं उस FIR में नामजद 14 आरोपियों में शामिल हैं, जिसे प्रारंभ में दंगा, घर में घुसपैठ और हत्या के प्रयास से संबंधित धाराओं में दर्ज किया गया। बाद में घायल की मृत्यु के बाद इसे IPC की धारा 302 में परिवर्तित कर दिया गया।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 14 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। कुछ आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार किया गया, जबकि वर्तमान याचिकाकर्ताओं सहित पांच आरोपियों को फरार दिखाया गया। बाद में वर्ष 2024 में इन तीनों महिलाओं को अलग-अलग तिथियों पर गिरफ्तार किया गया और वे तब से न्यायिक हिरासत में थीं।
इनकी जमानत याचिकाएं प्रिंसिपल सेशन जज अनंतनाग ने यह कहते हुए खारिज कर दी थीं कि मुकदमे का चरण जमानत देने की अनुमति नहीं देता और जांच के दौरान उनके आचरण को भी आधार बनाया गया। सेशन कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि अब तक दर्ज साक्ष्य उन्हें दोषमुक्त नहीं करता।
इस दृष्टिकोण की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 437(1) के उस प्रावधान को लगभग नजरअंदाज किया, जो विशेष रूप से महिलाओं को गैर-जमानती अपराधों में भी जमानत देने की अनुमति प्रदान करता है। न्यायालय ने कहा कि विधायकों ने महिलाओं को एक अलग वर्ग मानते हुए यह प्रावधान किया ताकि अदालतें केवल CrPC की धारा 437(1) की कठोरता से बंधी न रहें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान महिलाओं को स्वतः जमानत देने का आदेश नहीं देता, लेकिन जैसे ही किसी महिला आरोपी की जमानत याचिका अदालत के समक्ष आती है। यह प्रावधान विशेष न्यायिक जिम्मेदारी को सक्रिय कर देता है। न्यायालय ने कहा कि समान परिस्थितियों में जहां पुरुष आरोपी को जमानत से वंचित किया जा सकता है, वहीं महिला आरोपी के मामले में अदालत के पास अलग दृष्टिकोण अपनाने की गुंजाइश रहती है।
हाईकोर्ट ने अभियोजन रिकॉर्ड का भी विश्लेषण किया और पाया कि शिकायत और FIR में सभी आरोपियों के खिलाफ सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए, विशेषकर महिलाओं की भूमिका के संबंध में किसी प्रकार का विशिष्ट आरोप सामने नहीं आया। कथित हथियार भी लाठी-डंडे बताए गए थे और महिलाओं की वास्तविक भूमिका अभियोजन कथन में स्पष्ट रूप से उभरकर नहीं आई।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत और मानवीय परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया। अदालत ने उल्लेख किया कि एक याचिकाकर्ता स्तनपान कराने वाली मां है, तीनों के छोटे बच्चे हैं और एक महिला ने हिरासत के दौरान अपने आठ वर्षीय बेटे को डूबने की घटना में खो दिया जिसके अंतिम संस्कार में भी वह शामिल नहीं हो सकी।
मुकदमे की प्रगति को देखते हुए अदालत ने कहा कि अब तक कई प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही हो चुकी है और स्थिति उस चरण से आगे बढ़ चुकी है, जब सेशन कोर्ट ने जमानत से इनकार किया था।
इन सभी तथ्यों, आरोपों की प्रकृति, महिलाओं के प्रति कानून द्वारा प्रदत्त विशेष संरक्षण और CrPC की धारा 437(1) के प्रावधानों को समग्र रूप से देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि मुकदमे की लंबित अवधि के दौरान याचिकाकर्ताओं को जेल में रखना उचित नहीं है।
अदालत ने तीनों महिलाओं को 50,000 के निजी मुचलके और समान राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही यह शर्त लगाई कि वे ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश से बाहर नहीं जाएंगी।

