BNSS का पूरा नाम बताए बिना हिरासत का आधार नहीं बन सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निरोधात्मक हिरासत आदेश रद्द किया
Amir Ahmad
2 Jun 2026 5:52 PM IST

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि कोई सामान्य नागरिक BNSS का पूरा नाम या अर्थ जानने के लिए बाध्य नहीं है जब तक कि कानून-व्यवस्था से जुड़े अधिकारी और संबंधित मजिस्ट्रेट स्वयं उसका पूरा विवरण न दें। अदालत ने इसी आधार पर एक निरोधात्मक हिरासत आदेश रद्द करते हुए इसे कानून की प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग करार दिया।
जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने यह फैसला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कठुआ के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम, 1978 के तहत जारी निरोधात्मक हिरासत आदेश को चुनौती दी गई।
मामले में याचिकाकर्ता बिट्टू राम को लोक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया। हिरासत के आधारों में उनकी कथित आपत्तिजनक गतिविधियों का उल्लेख किया गया, जो सभी कथित तौर पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 128 से संबंधित कार्यवाहियों पर आधारित थीं। हालांकि, दस्तावेजों में 'बीएनएसएस' का केवल संक्षिप्त रूप लिखा गया और उसका पूरा नाम नहीं बताया गया।
अदालत ने कहा कि न्यायालय तो यह समझ सकता है कि 'BNSS' का अर्थ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 है, लेकिन किसी सामान्य नागरिक से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अपने आदेश में अदालत ने कहा,
“एक सामान्य नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह 'BNSS' का पूरा नाम या अर्थ जानता हो, जब तक कि कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियां और संबंधित मजिस्ट्रेट स्वयं उसका पूरा नाम उजागर न करें।”
अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ 20 जनवरी, 26 जनवरी, 5 फरवरी और 21 फरवरी 2025 को धारा 128 के तहत कार्यवाही शुरू की गई। न्यायालय ने कहा कि इतने कम समय में चार बार कार्यवाही शुरू होना इस बात का संकेत है कि किसी भी कार्यवाही को तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाया गया, फिर भी व्यक्ति को निरोधात्मक हिरासत में भेज दिया गया।
जस्टिस राहुल भारती ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे आधारों पर किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने की अनुमति दी जाए तो नागरिकों के मौलिक अधिकार जिला पुलिस और जिला मजिस्ट्रेट की मनमानी से सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।
अदालत ने कहा,
“यदि ऐसे आधार पर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन स्वीकार कर लिया जाए तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार जिला पुलिस और जिला मजिस्ट्रेट के हाथों असुरक्षित हो जाएगा। यह स्थिति सामान्य कानून को भी अप्रभावी घोषित करने जैसी होगी। इसलिए वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता की निरोधात्मक हिरासत कानून की प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है।”
हाईकोर्ट ने माना कि केवल इसी आधार पर हिरासत आदेश रद्द किया जाना पर्याप्त है। इसके साथ ही अदालत ने जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश सरकार द्वारा पारित किसी भी अनुमोदन, पुष्टि या अवधि-विस्तार संबंधी आदेश को भी निरस्त किया।
अंत में अदालत ने निर्देश दिया कि बिट्टू राम को तत्काल व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहाल करते हुए रिहा किया जाए। संबंधित जिला या केंद्रीय जेल के अधीक्षक को आदेश दिया गया कि याचिकाकर्ता को बिना किसी देरी के तुरंत रिहा किया जाए।

