आतंक गतिविधियों में इस्तेमाल वाहन का कब्जा छोड़ने वाला पंजीकृत मालिक उसकी रिहाई नहीं मांग सकता: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट:

Praveen Mishra

30 March 2026 1:41 PM IST

  • आतंक गतिविधियों में इस्तेमाल वाहन का कब्जा छोड़ने वाला पंजीकृत मालिक उसकी रिहाई नहीं मांग सकता: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट:

    जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी वाहन के पंजीकृत मालिक ने पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए वाहन का कब्जा किसी आरोपी को सौंप दिया है, तो वह बाद में उस वाहन की रिहाई के लिए दावा नहीं कर सकता, खासकर तब जब वाहन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में हुआ हो।

    यह फैसला जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अजीम की खंडपीठ ने एक अपील खारिज करते हुए सुनाया। यह अपील राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 21 के तहत दायर की गई थी, जिसमें विशेष NIA अदालत, कुपवाड़ा के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने वाहन की रिहाई की मांग को अस्वीकार कर दिया था।

    मामले के अनुसार, जनवरी 2022 में एक ओवर ग्राउंड वर्कर फरीद अहमद चौहान को गिरफ्तार किया गया था। उसके पास से हथियार और गोला-बारूद बरामद हुए थे, जबकि आगे की जांच में उसके घर से बड़ी मात्रा में हथियार, कारतूस और विदेशी मुद्रा भी मिली। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी एक Tata Nexon वाहन का इस्तेमाल अवैध हथियारों के परिवहन के लिए कर रहा था, जिसे बाद में जब्त कर लिया गया।

    अपीलकर्ता, जो वाहन की पंजीकृत मालिक थी, ने दावा किया कि उसने 8 जुलाई 2021 को आरोपी के पक्ष में पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर वाहन का कब्जा उसे सौंप दिया था। उसने यह भी कहा कि वाहन बिक्री के लिए दिया गया था और आंशिक भुगतान भी प्राप्त हुआ था। आरोपी के जेल में होने के बाद उसने वाहन की रिहाई के लिए आवेदन दायर किया।

    हालांकि, कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता न तो मूल पावर ऑफ अटॉर्नी प्रस्तुत कर सकी और न ही अपने दावे को सुसंगत तरीके से स्थापित कर पाई। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता ने विरोधाभासी रुख अपनाया और तथ्यों को छिपाया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह “unclean hands” के साथ अदालत आई है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि जब अपीलकर्ता स्वयं मान रही है कि उसने वाहन का कब्जा आरोपी को सौंप दिया था, तो वह उसकी कस्टडी का दावा नहीं कर सकती। साथ ही, अदालत ने माना कि यह आवेदन आरोपी द्वारा वाहन छुड़वाने का एक प्रयास हो सकता है, जिससे अभियोजन को नुकसान पहुंच सकता है।

    अदालत ने जांच एजेंसी पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब तक वाहन की जब्ती (confiscation) की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, जबकि अभियोजन का दावा है कि वाहन आतंकी गतिविधियों से प्राप्त धन से खरीदा गया था।

    इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता के पास अपील दायर करने का कोई अधिकार (locus standi) नहीं है और उसने न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है। परिणामस्वरूप, अदालत ने अपील को खारिज कर दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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