जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फारूक अब्दुल्ला-JKCA मामले में ED की याचिका खारिज की

  • जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फारूक अब्दुल्ला-JKCA मामले में ED की याचिका खारिज की

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही कोई पक्ष आपराधिक अदालत का ध्यान आरोपों में किसी कथित चूक की ओर दिला सकता है, लेकिन CrPC की धारा 216 के तहत आरोपों में बदलाव करने या नए आरोप जोड़ने की शक्ति आखिरकार अदालत के पास ही होती है। इस शक्ति का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से शुरुआती तौर पर प्रस्तावित अपराध के तत्व सामने आते हों।

    जस्टिस संजय परिहार ने यह टिप्पणी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रिवीजन याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की। ED ने अपनी उस याचिका को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (JKCA) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला और अन्य के खिलाफ पुराने रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 411 और 424 के तहत आरोप जोड़ने की मांग की थी।

    हालांकि, अदालत ने ED की मुख्य मांग खारिज की और कहा कि CBI की चार्जशीट में मौजूद सामग्री से शुरुआती तौर पर किसी भी अपराध के ज़रूरी तत्व सामने नहीं आते हैं।

    यह मामला JKCA को BCCI (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) से मिले फंड के कथित गबन से जुड़े आरोपों से संबंधित है।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, BCCI ने JKCA को लगभग ₹112.13 करोड़ भेजे, जिसमें से CBI को कथित तौर पर लगभग ₹43.69 करोड़ का गबन मिला। CBI की चार्जशीट में आरोप लगाया गया कि अहसान अहमद मिर्ज़ा ने JKCA के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला, तत्कालीन महासचिव मोहम्मद सलीम खान और बैंक अधिकारी बशीर अहमद मिसगर के साथ मिलकर कथित तौर पर अनधिकृत लेन-देन के ज़रिए JKCA के फंड को निजी खातों में ट्रांसफर किया।

    CBI ने आखिरकार 2018 में अपनी चार्जशीट दाखिल की, जिसमें RPC की धारा 120-B, 406 और 409 के तहत आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात और गबन का आरोप लगाया गया। इसके बाद ED ने RPC की धारा 411 और 424 को जोड़ने की मांग की। उनका तर्क था कि CBI की चार्ज-शीट में चोरी का सामान मिलने और बेईमानी या धोखाधड़ी से संपत्ति हटाने या छिपाने की बात भी सामने आई थी। ट्रायल कोर्ट ने इस मांग को ठुकरा दिया।

    इससे नाराज़ होकर ED ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। उनका तर्क था कि उन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से यह छूट मिली थी कि वे आरोप जोड़ने के लिए ट्रायल कोर्ट का रुख कर सकते हैं।

    उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने खुद पहले उनकी अर्ज़ी को सुनवाई के लायक माना, इसलिए बाद में वे इसे इस आधार पर खारिज नहीं कर सकते कि ED के पास मामला उठाने का अधिकार (locus standi) नहीं है।

    दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि CBI की जांच में केवल RPC की धारा 120-B, 406 और 409 के तहत अपराध सामने आए। ED उन अपराधों को जोड़कर जांच को फिर से शुरू नहीं कर सकती, जिन्हें जांच एजेंसी ने खुद अपराध नहीं माना।

    CBI का भी यही कहना था कि उनकी जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे RPC की धारा 411 या 424 को जोड़ने की ज़रूरत पड़े।

    Case Title: Directorate of Enforcement v. Md. Saleem Khan & Others

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