तलाक के बाद 'स्त्रीधन' अपने पास रखना 'लिमिटेशन' के लिहाज से 'लगातार चलने वाला अपराध' नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
26 Oct 2026 8:33 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक की डिक्री से शादी खत्म हो जाने के बाद पत्नी के 'स्त्रीधन' को अपने पास रखना 'लगातार चलने वाला अपराध' (Continuing Offence) नहीं माना जा सकता।
अदालत ने तलाक और 'ज्यूडिशियल सेपरेशन' (न्यायिक अलगाव) के बीच फर्क बताते हुए कहा कि 'ज्यूडिशियल सेपरेशन' में पति-पत्नी के बीच कानूनी रिश्ता बना रहता है, लेकिन तलाक होने पर यह रिश्ता पूरी तरह खत्म हो जाता है। यह अंतर आपराधिक कार्यवाही के लिए 'लिमिटेशन पीरियड' (समय-सीमा) तय करने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है।
जस्टिस चिराग भानु सिंह ने टिप्पणी की:
"इस तरह देखा जाए तो 'स्त्रीधन' की मांग करना एक 'लगातार चलने वाला अपराध' बना रहेगा। लेकिन शादी खत्म हो जाने के बाद, यह वैसा नहीं रह जाता। [...] पति-पत्नी के बीच रिश्ता खत्म हो जाने के बाद, धारा 498-A और 'स्त्रीधन' की मांग से जुड़े अपराध अब 'लगातार चलने वाले अपराध' नहीं रह जाते।"
शिकायतकर्ता कंचन लता ने 2007 में याचिकाकर्ता टोटा राम से शादी की थी। उनका आरोप है कि टोटा राम ने उनका 'स्त्रीधन' हड़प लिया और 2011 से बार-बार मांगने के बावजूद उसे वापस नहीं किया। उन्होंने 19 जुलाई 2017 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 और 506 के तहत शिकायत दर्ज कराई।
शिमला के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने 2018 में आरोपी को समन भेजा और 2022 में आरोप तय करने का नोटिस जारी किया। इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए पति ने CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता) की धारा 482 के तहत हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि यह शिकायत 'लिमिटेशन' (समय-सीमा) के दायरे से बाहर है, क्योंकि 9 अक्टूबर 2012 को ही तलाक की डिक्री से शादी खत्म हो चुकी है।
अदालत ने माना कि 19 जुलाई 2017 को दर्ज की गई यह शिकायत CrPC की धारा 468 के तहत तय तीन साल की समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) से बाहर है। अदालत ने 'न्यायिक अलगाव' (जुडिशियल सेपरेशन) और 'तलाक' के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक वैवाहिक संबंध कायम हैं, तब तक स्त्रीधन को अपने पास रखना एक 'लगातार चलने वाला अपराध' हो सकता है, लेकिन विवाह खत्म हो जाने के बाद ऐसा होना जरूरी नहीं है।
चूंकि दोनों पक्षों का विवाह 9 अक्टूबर, 2012 को खत्म हो गया, इसलिए अदालत ने माना कि शिकायत तय समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) के बाद दर्ज की गई। इसके चलते अदालत ने आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिसमें समन जारी करने का आदेश और आरोप का नोटिस भी शामिल है।
Case Title : TR v/s KL

