'खुफिया सुराग बरारी' पुलिस की सामान्य कोशिश, न कि NDPS Act की धारा 42 लागू करने वाली पहले से मिली कोई खास जानकारी: एचपी हाईकोर्ट

Shahadat

7 Sept 2026 7:55 PM IST

  • खुफिया सुराग बरारी पुलिस की सामान्य कोशिश, न कि NDPS Act की धारा 42 लागू करने वाली पहले से मिली कोई खास जानकारी: एचपी हाईकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस डायरी एंट्री में इस्तेमाल किया गया शब्द "खुफिया सुराग बरारी" NDPS अपराध की किसी खास पहले से मिली जानकारी को नहीं दिखाता है, जिससे नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 42 का अनिवार्य पालन करना पड़े।

    कोर्ट ने कहा कि यह शब्द किसी खास इलाके में अपराध होने की संभावना के बारे में गुप्त जानकारी पाने के लिए पुलिस की सामान्य खोज या कोशिश को बताता है।

    जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा:

    "आवेदक की यह दलील गलत है कि 'खुफिया सुराग बरारी' का मतलब अपराध की पहले से मिली जानकारी है। ... सुराग बरारी का मतलब अपराध होने की पहले से मिली जानकारी नहीं है। यह किसी जगह या इलाके में अपराध होने की आशंका के चलते गुप्त जानकारी पाने की सामान्य खोज या कोशिश है।"

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला कुल्लू के ब्रो पुलिस स्टेशन में NDPS Act की धारा 20 और 29 के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है। प्रतिबंधित सामान (कॉन्ट्राबैंड) की बरामदगी के मामले में रामपुर बुशहर में किन्नौर के स्पेशल जज-II ने दिनेश कुमार को दोषी ठहराया।

    सजा से परेशान होकर उसने अपनी सजा पर रोक लगाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसका मुख्य तर्क था कि पुलिस के पास पहले से जानकारी थी, लेकिन उसने NDPS Act की धारा 42 का पालन नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने आवेदक की इस दलील को खारिज किया कि पुलिस को कोई खास जानकारी मिली, जिससे NDPS Act की धारा 42 लागू होती हो। कोर्ट ने कहा कि "खुफिया सुराग बरारी" का मतलब सिर्फ़ संभावित नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों की जांच, पता लगाने या सुराग पाने की पुलिस की सामान्य कोशिश है, न कि किसी व्यक्ति, वाहन या प्रतिबंधित सामान ले जाने के तरीके की पहचान करने वाली कोई खास जानकारी।

    कोर्ट ने NCB फॉर्म में खाली कॉलम की वजह से कस्टडी की चेन में कोई बड़ी कमी होने की बात भी नहीं मानी। कोर्ट ने देखा कि पहले जांच अधिकारी ने पार्सल दूसरे जांच अधिकारी को सौंपा था, जिसने उसे दोबारा सील करने के लिए SHO के सामने पेश किया। संबंधित जनरल डायरी एंट्रीज़ में ज़ब्त किए गए प्रतिबंधित सामान को संभालने और आगे भेजने की जानकारी भी दर्ज थी, जिससे ज़रूरी सबूत मिल गए।

    बेंच ने यह भी कहा कि सिर्फ़ इसलिए अभियोजन पक्ष की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्वतंत्र गवाह मुकर गया। गवाह ने घटनास्थल पर पुलिस, आरोपी और गाड़ियों की मौजूदगी की पुष्टि की थी, जबकि कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारियों के भरोसेमंद और ठोस सबूतों के आधार पर सज़ा सुनाई जा सकती है।

    रिकॉर्ड पर मौजूद सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद कोर्ट को आवेदक द्वारा उठाए गए आधारों पर बरी होने की कोई उचित संभावना नहीं दिखी, इसलिए उसकी सज़ा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। नतीजतन, आवेदन खारिज कर दिया गया।

    Case Name: Dinesh Kumar v/s State of H.P.

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